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पांच हजार साल पुराना है कार्तिक पूर्णिमा मेले का इतिहास
Updated Fri, 23 Nov 2018 01:08 AM IST
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तिगरीधाम। कार्तिक पूर्णिमा के गंगा स्नान मेले का इतिहास करीब पांच हजार साल पुराना है। महाभारत काल में विनाशकारी युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों के मन युद्ध की विभीषिका और नरसंहार को देखकर भारी ग्लानि हुई थी और वे इस सोच में पड गए कि युद्ध में मारे गए असंख्य कुटुम्बियों, बंधुओं और निर्दोष लोगों की आत्मा की शांति के लिए क्या उपाय करें। कार्तिक मास की चतुर्दशी के दिन गंगा तट पर पिंडदान किए गए और यह प्रथा द्वापर युग से आज तक चली आ रही है।
कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर तिगरीधाम के गंगा तट पर लगने वाला मेला, विशालतम मेलों में से एक है। मेला गंगा किनारे करीब दस किलोमीटर के दायरे में लगता है। परंतु मौजूदा वक्ता में मेला पिकनिक का केंद्र बनता जा रहा है।
मेले का इतिहास बताने वाले बुजुर्ग नहीं रहे और जो इतिहास के विषय में जानते है, वे भौतिकवाद में फंसकर रह गए है। द्वापर युग में महाभारत के युद्ध में मारे गए लोगों की आत्मा शांति के लिए कार्तिक पूर्णिमा पर पिंडदान किए गए थे। तब से आज तक यह प्रथा चली आ रही है।
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तिगरीधाम और उसके पार के क्षेत्र का उल्लेख शिव पुराण में खांडवी वन के शिव बल्लभपुर (गढ़ मुक्तेश्वर) में भगवान परशुराम ने मंदिर की स्थापना की थी।
एकादशी से चतुर्दशी तक इस स्थान पर महाभारत युद्ध में मारे गए सभी लोगों की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ किया गया तथा चतुर्दशी की संध्या यज्ञ की समाप्ति पर उन आत्माओं को गंगा में दीपदान कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
अगले दिन प्रात: पूर्णमासी (कार्तिक पूर्णिमा) को सभी ने गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना की थी। इसके बाद से ही कार्तिक पूर्णिमा पर इस मेले के आयोजन की परंपरा शुरू हुई है।
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कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर तिगरीधाम के गंगा तट पर लगने वाला मेला, विशालतम मेलों में से एक है। मेला गंगा किनारे करीब दस किलोमीटर के दायरे में लगता है। परंतु मौजूदा वक्ता में मेला पिकनिक का केंद्र बनता जा रहा है।
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मेले का इतिहास बताने वाले बुजुर्ग नहीं रहे और जो इतिहास के विषय में जानते है, वे भौतिकवाद में फंसकर रह गए है। द्वापर युग में महाभारत के युद्ध में मारे गए लोगों की आत्मा शांति के लिए कार्तिक पूर्णिमा पर पिंडदान किए गए थे। तब से आज तक यह प्रथा चली आ रही है।
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तिगरीधाम और उसके पार के क्षेत्र का उल्लेख शिव पुराण में खांडवी वन के शिव बल्लभपुर (गढ़ मुक्तेश्वर) में भगवान परशुराम ने मंदिर की स्थापना की थी।
एकादशी से चतुर्दशी तक इस स्थान पर महाभारत युद्ध में मारे गए सभी लोगों की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ किया गया तथा चतुर्दशी की संध्या यज्ञ की समाप्ति पर उन आत्माओं को गंगा में दीपदान कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
अगले दिन प्रात: पूर्णमासी (कार्तिक पूर्णिमा) को सभी ने गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना की थी। इसके बाद से ही कार्तिक पूर्णिमा पर इस मेले के आयोजन की परंपरा शुरू हुई है।