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16 सचिवों पर 53 ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी
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भादर (अमेठी)। ब्लॉक क्षेत्र की 53 ग्राम पंचायतों के सचिवालय झोले में चल रहे हैं। यहां के विकास की जिम्मेदारी भी उधार के अधिकारियों व कर्मचारियों पर है। यह कर्मचारी अभिलेख लिए गांव-गांव घूमते हैं। कर्मचारियों की कमी से जहां गांव के विकास का पहिया थम गया है वहीं हजारों ग्रामीणों की समस्याओं का निराकरण भी बमुश्किल हो पा रहा है।
ग्राम पंचायतों के विकास को गति दिलाए जाने में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले ग्राम पंचायत सचिव की विकास क्षेत्र में बड़ी कमी है। आलम यह है कि क्षेत्र के 53 ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी सिर्फ 16 ग्राम पंचायत सचिवों के जिम्मे है। एक-एक सचिव के पास दो से पांच ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी है।
मजे की बात तो यह है कि ग्राम सचिवों की कमी की वजह से जो हैं भी उनमें अधिक से अधिक गांव के विकास कार्यों की जिम्मेदारी लेने की होड़ लगी हुई है। प्रभारी के नाम पर तैनात उधार के अधिकारी-कर्मचारी अपने चहेते ग्राम प्रधानों का गांव लेने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। जब कि कुछ सचिव ऐसे हैं जिनके पास एक से दो गांव का ही जिम्मा है।
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कुछ रसूख वाले ऐसे सचिव हैं जिनके पास पांच से छह ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी है। बताया जाता है कि अधिक गांव मिलने से उन्हें अधिक लाभ मिल जाता है। इसलिए कर्मचारियों में अधिक गांव लेने की होड़ लगी हुई है। जबकि ग्राम पंचायत निधि के खाते का संचालन संबंधित गांव के ग्राम प्रधान व ग्राम सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से होता है।
मनरेगा से लेकर 12वें 14वें राज्य वित्त, कार्यक्रम के संचालन, स्थायी पात्रता सूची के साथ खुली बैठक कराना, मिड-डे-मील सहित अन्य कार्यवाहियों का संचालन इन्हीं ग्राम सचिवों के भरोसे है। यहां हालात यह है कि इन्हें फीडिंग से लेकर धन अवमुक्त करने से फुरसत नहीं मिलती है।
एक ग्राम सचिव के पास कई ग्राम पंचायतों का प्रभार होने से अधिकांश गांव का पूरा अभिलेख सचिव बैग में लेकर घूमता है। इसलिए कि पता नहीं कहां उसे किस गांव के अभिलेख की जरूरत पड़ जाए। तमाम कार्यक्रमों में व्यस्त ग्राम सचिव न तो जन्म मृत्यु पंजीयन के लिए समय दे पाते हैं और न ही परिवार रजिस्टर पूरा कर पाते हैं।
जरूरत पड़ने पर जब ग्रामीण इनसे अभिलेख मांगता है तो उसी से पूछ कर उसी समय सब कुछ पूरा करके दे दिया जाता है। यही नहीं इन्हें धन के आय-व्यय का ब्यौरा तैयार करने तक का समय नहीं मिल पाता है उसे अन्य कर्मियों व निजी लोगों से कराना पड़ रहा है। कुल मिलाकर गांव के विकास का कार्य जहां कच्छप गति से चल रहा है वहीं ग्रामीणों की व्यथा सुनने वाला भी कोई नहीं।
हो रही दिक्कत : बीडीओ
बीडीओ हरिश्चंद्र सिंह ने कहा कि कर्मचारियों की कमी से विकास कार्यों में व्यवधान हो रहा है। कहा कि कम संसाधन में गांव के बेहतर विकास की कोशिश की जाती है। ग्रामीणों की समस्याओं व निस्तारण में कोताही मिलने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाती है।
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ग्राम पंचायतों के विकास को गति दिलाए जाने में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले ग्राम पंचायत सचिव की विकास क्षेत्र में बड़ी कमी है। आलम यह है कि क्षेत्र के 53 ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी सिर्फ 16 ग्राम पंचायत सचिवों के जिम्मे है। एक-एक सचिव के पास दो से पांच ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी है।
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मजे की बात तो यह है कि ग्राम सचिवों की कमी की वजह से जो हैं भी उनमें अधिक से अधिक गांव के विकास कार्यों की जिम्मेदारी लेने की होड़ लगी हुई है। प्रभारी के नाम पर तैनात उधार के अधिकारी-कर्मचारी अपने चहेते ग्राम प्रधानों का गांव लेने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। जब कि कुछ सचिव ऐसे हैं जिनके पास एक से दो गांव का ही जिम्मा है।
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कुछ रसूख वाले ऐसे सचिव हैं जिनके पास पांच से छह ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी है। बताया जाता है कि अधिक गांव मिलने से उन्हें अधिक लाभ मिल जाता है। इसलिए कर्मचारियों में अधिक गांव लेने की होड़ लगी हुई है। जबकि ग्राम पंचायत निधि के खाते का संचालन संबंधित गांव के ग्राम प्रधान व ग्राम सचिव के संयुक्त हस्ताक्षर से होता है।
मनरेगा से लेकर 12वें 14वें राज्य वित्त, कार्यक्रम के संचालन, स्थायी पात्रता सूची के साथ खुली बैठक कराना, मिड-डे-मील सहित अन्य कार्यवाहियों का संचालन इन्हीं ग्राम सचिवों के भरोसे है। यहां हालात यह है कि इन्हें फीडिंग से लेकर धन अवमुक्त करने से फुरसत नहीं मिलती है।
एक ग्राम सचिव के पास कई ग्राम पंचायतों का प्रभार होने से अधिकांश गांव का पूरा अभिलेख सचिव बैग में लेकर घूमता है। इसलिए कि पता नहीं कहां उसे किस गांव के अभिलेख की जरूरत पड़ जाए। तमाम कार्यक्रमों में व्यस्त ग्राम सचिव न तो जन्म मृत्यु पंजीयन के लिए समय दे पाते हैं और न ही परिवार रजिस्टर पूरा कर पाते हैं।
जरूरत पड़ने पर जब ग्रामीण इनसे अभिलेख मांगता है तो उसी से पूछ कर उसी समय सब कुछ पूरा करके दे दिया जाता है। यही नहीं इन्हें धन के आय-व्यय का ब्यौरा तैयार करने तक का समय नहीं मिल पाता है उसे अन्य कर्मियों व निजी लोगों से कराना पड़ रहा है। कुल मिलाकर गांव के विकास का कार्य जहां कच्छप गति से चल रहा है वहीं ग्रामीणों की व्यथा सुनने वाला भी कोई नहीं।
हो रही दिक्कत : बीडीओ
बीडीओ हरिश्चंद्र सिंह ने कहा कि कर्मचारियों की कमी से विकास कार्यों में व्यवधान हो रहा है। कहा कि कम संसाधन में गांव के बेहतर विकास की कोशिश की जाती है। ग्रामीणों की समस्याओं व निस्तारण में कोताही मिलने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाती है।