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Amethi News: श्रद्धालुओं ने की तारा देवी की पूजा-अर्चना
Sat, 28 Jun 2025 12:51 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Sat, 28 Jun 2025 12:51 AM IST
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जगदीशपुर स्थित दुर्गा मंदिर में पूजन करते श्रद्धालु। संवाद
जगदीशपुर (अमेठी)। आषाढ़ गुप्त नवरात्र के दूसरे दिन शुक्रवार को श्रद्धालुओं ने स्थानीय सेल परिसर स्थित आनंदेश्वर शिव मंदिर में स्थापित मां दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, कृष्ण-राधा और श्रीराम-सीता की विधिपूर्वक पूजा कर मंगलकामना की। दर्शन-पूजन के लिए सुबह से भक्तों का तांता लगा रहा।
मंदिर परिसर में मौजूद पंडित अनिल कुमार शास्त्री ने विशेष रूप से महाविद्या तारा देवी की पूजा संपन्न कराई। उन्होंने बताया कि तारा देवी को श्मशान की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्र के दूसरे दिन तारा देवी की उपासना का विशेष विधान है। ये मां काली का ही दूसरा स्वरूप मानी जाती हैं, जिनके गले में नरमुंडों की माला रहती है। तंत्र साधना में देवी तारा को सिद्धि और मुक्ति देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
पंडित अनिल शास्त्री ने बताया कि बौद्ध धर्म में भी मां तारा का विशेष स्थान है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने भी मां तारा की साधना की थी। गुरु वशिष्ठ ने भी मोक्ष की प्राप्ति के लिए तारा देवी की आराधना की थी। देवी तारा के तीन प्रमुख स्वरूप हैं उग्रतारा, एकजटा और नील सरस्वती।
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कब और कैसे प्रकट हुईं तारा देवी
पंडित आशुतोष पांडेय के अनुसार तारा देवी का जन्म मेरु पर्वत के पश्चिम में चोलना नदी के किनारे हुआ था। उन्होंने बताया कि एक दैत्य हयग्रीव का वध करने के लिए मां महाकाली ने नील वर्ण धारण किया और तारा स्वरूप में प्रकट हुईं। महाकाल संहिता के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी को देवी तारा प्रकट हुईं और चैत्र शुक्ल नवमी की रात को तारा रात्रि कहा जाता है। यह भी मान्यता है कि रावण वध के समय राम की शक्ति के रूप में तारा देवी ही प्रकट हुईं थीं। उनके विकराल रूप से देवता भी भयभीत हो उठे थे। ब्रह्माजी ने स्वयं उन्हें व्याघ्र चर्म प्रदान कर शांत किया था, जिसके बाद देवी लंबोदरी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।
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मंदिर परिसर में मौजूद पंडित अनिल कुमार शास्त्री ने विशेष रूप से महाविद्या तारा देवी की पूजा संपन्न कराई। उन्होंने बताया कि तारा देवी को श्मशान की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्र के दूसरे दिन तारा देवी की उपासना का विशेष विधान है। ये मां काली का ही दूसरा स्वरूप मानी जाती हैं, जिनके गले में नरमुंडों की माला रहती है। तंत्र साधना में देवी तारा को सिद्धि और मुक्ति देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
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पंडित अनिल शास्त्री ने बताया कि बौद्ध धर्म में भी मां तारा का विशेष स्थान है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने भी मां तारा की साधना की थी। गुरु वशिष्ठ ने भी मोक्ष की प्राप्ति के लिए तारा देवी की आराधना की थी। देवी तारा के तीन प्रमुख स्वरूप हैं उग्रतारा, एकजटा और नील सरस्वती।
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कब और कैसे प्रकट हुईं तारा देवी
पंडित आशुतोष पांडेय के अनुसार तारा देवी का जन्म मेरु पर्वत के पश्चिम में चोलना नदी के किनारे हुआ था। उन्होंने बताया कि एक दैत्य हयग्रीव का वध करने के लिए मां महाकाली ने नील वर्ण धारण किया और तारा स्वरूप में प्रकट हुईं। महाकाल संहिता के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी को देवी तारा प्रकट हुईं और चैत्र शुक्ल नवमी की रात को तारा रात्रि कहा जाता है। यह भी मान्यता है कि रावण वध के समय राम की शक्ति के रूप में तारा देवी ही प्रकट हुईं थीं। उनके विकराल रूप से देवता भी भयभीत हो उठे थे। ब्रह्माजी ने स्वयं उन्हें व्याघ्र चर्म प्रदान कर शांत किया था, जिसके बाद देवी लंबोदरी नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।