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मुलायम के करीबी अहमद हसन को अखिलेश भी देते थे सम्मान
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अंबेडकरनगर। सपा की राजनीति में जलालपुर निवासी अहमद हसन का कद काफी बड़ा था। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के अत्यंत नजदीकी होने के चलते सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव भी उनका काफी सम्मान करते थे। ऐसे नेता विधान परिषद में नेता विरोधी दल पूर्व मंत्री अहमद हसन का शनिवार को लखनऊ में इलाज के दौरान निधन हो गया। वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे।
जलालपुर के मूल निवासी अहमद हसन वर्ष 1960 में पुलिस की नौकरी में आए थे। इसके बाद से वे नीली व लाल बत्ती के अधिकारी लगातार बने रहे। नौकरी के समय जहां उनके पास नीली बत्ती चमकती रही, वहीं डीआईजी से सेवानिवृत्त होने के बाद से उनके पास लगभग लाल बत्ती गाड़ी उपलब्ध होती रही। पूर्व मंत्री अहमद हसन समाजवादी पार्टी के बड़े और सम्मानित राजनेता रहे। वह वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान परिषद में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य कर रहे थे। उन्होंने सपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया।
सार्वजनिक सेवाओं में लंबे कॅरियर के साथ ही उन्हें ईमानदारी के अलावा कर्तव्य निष्ठा और सामाजिक सेवाओं के लिए भारत के राष्ट्रपति की ओर से वीरता पदक, भारतीय पुलिस पदक, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव के लिए सराहनीय पुलिस पदक से सम्मानित किया गया था।
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दो जनवरी 1934 को अंबेडकरनगर में जन्मे अहमद हसन के पिता मौलाना मोहम्मद यूसुफ जलालपुरी धार्मिक विद्वान और एक समृद्ध व्यवसायी थे। अपने पिता के संरक्षण में अहमद हसन हमेशा से पढ़ाई में अव्वल थे। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए। बीए, एलएलबी की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने सिविल सेवाओं की तैयारी शुरू कर दी। यूपीएससी परीक्षा को सफलतापूर्वक पास कर 1958 में भारतीय पुलिस सेवा में चयनित हो गए।
उनका पहला आधिकारिक प्रभार 1960 में लखनऊ के पुलिस उपाधीक्षक के रूप में था। एक पुलिस अधिकारी के रूप में वह अपनी निडरता और साहसिक नेतृत्व के प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत की और कई अपराधियों की तमाम कुख्यात गतिविधियों को सफलतापूर्वक समाप्त किया था। वर्ष 1967 में एटा के डीएसपी के रूप में उन्होंने खूंखार डकैत चबूराम का सफाया कर उसके सभी साथियों को गिरफ्तार कर लिया। असाधारण वीरता के इस कार्य के लिए अहमद हसन को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया।
उन्हें 1979 में विधानसभा और सांसद चुनावों के दौरान एटा में पूर्ण कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए मेधावी पुलिस पदक से भी सम्मानित किया गया। अहमद हसन का मानना था कि समाज में अपराध तभी कम हो सकते हैं, जब जनता और पुलिस के बीच सीधा संपर्क हो। वह हमेशा लोगों के साथ शांति और सद्भाव की भावना का संचार करने के लिए लगे रहे। उन्होंने लंबे समय तक बरेली में पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्य किया। जिले में उन्होंने जो शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की थी। उन्हें 1989 में डीआईजी रैंक में पदोन्नत किया गया। पुलिस में 30 से अधिक वर्षों तक शानदार सेवा देने के बाद 1992 में सेवानिवृत्त हुए।
पुलिस सेवा से अहमद हसन की सेवानिवृत्ति उन्हें समाज के आम नागरिकों की सेवा करने के अपने मिशन को पूरा करने से नहीं रोक सकी। वह मुलायम सिंह यादव की धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित थे। 1994 में अहमद हसन समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। अपनी राजनीतिक क्षमता के चलते उनको कई बार पदों से नवाजा गया। उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधान परिषद विपक्ष के नेता, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश, बेसिक शिक्षा मंत्री बने। वर्तमान में विपक्ष के नेता उत्तर प्रदेश विधान परिषद थे। 19 फरवरी को लखनऊ से उनके निधन की खबर आयी तो न सिर्फ सपा नेताओं व कार्यकर्ताओं बल्कि जनपदवासियों में शोक की लहर दौड़ गई।
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जलालपुर के मूल निवासी अहमद हसन वर्ष 1960 में पुलिस की नौकरी में आए थे। इसके बाद से वे नीली व लाल बत्ती के अधिकारी लगातार बने रहे। नौकरी के समय जहां उनके पास नीली बत्ती चमकती रही, वहीं डीआईजी से सेवानिवृत्त होने के बाद से उनके पास लगभग लाल बत्ती गाड़ी उपलब्ध होती रही। पूर्व मंत्री अहमद हसन समाजवादी पार्टी के बड़े और सम्मानित राजनेता रहे। वह वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान परिषद में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य कर रहे थे। उन्होंने सपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया।
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सार्वजनिक सेवाओं में लंबे कॅरियर के साथ ही उन्हें ईमानदारी के अलावा कर्तव्य निष्ठा और सामाजिक सेवाओं के लिए भारत के राष्ट्रपति की ओर से वीरता पदक, भारतीय पुलिस पदक, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव के लिए सराहनीय पुलिस पदक से सम्मानित किया गया था।
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दो जनवरी 1934 को अंबेडकरनगर में जन्मे अहमद हसन के पिता मौलाना मोहम्मद यूसुफ जलालपुरी धार्मिक विद्वान और एक समृद्ध व्यवसायी थे। अपने पिता के संरक्षण में अहमद हसन हमेशा से पढ़ाई में अव्वल थे। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए। बीए, एलएलबी की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने सिविल सेवाओं की तैयारी शुरू कर दी। यूपीएससी परीक्षा को सफलतापूर्वक पास कर 1958 में भारतीय पुलिस सेवा में चयनित हो गए।
उनका पहला आधिकारिक प्रभार 1960 में लखनऊ के पुलिस उपाधीक्षक के रूप में था। एक पुलिस अधिकारी के रूप में वह अपनी निडरता और साहसिक नेतृत्व के प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत की और कई अपराधियों की तमाम कुख्यात गतिविधियों को सफलतापूर्वक समाप्त किया था। वर्ष 1967 में एटा के डीएसपी के रूप में उन्होंने खूंखार डकैत चबूराम का सफाया कर उसके सभी साथियों को गिरफ्तार कर लिया। असाधारण वीरता के इस कार्य के लिए अहमद हसन को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया गया।
उन्हें 1979 में विधानसभा और सांसद चुनावों के दौरान एटा में पूर्ण कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए मेधावी पुलिस पदक से भी सम्मानित किया गया। अहमद हसन का मानना था कि समाज में अपराध तभी कम हो सकते हैं, जब जनता और पुलिस के बीच सीधा संपर्क हो। वह हमेशा लोगों के साथ शांति और सद्भाव की भावना का संचार करने के लिए लगे रहे। उन्होंने लंबे समय तक बरेली में पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्य किया। जिले में उन्होंने जो शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की थी। उन्हें 1989 में डीआईजी रैंक में पदोन्नत किया गया। पुलिस में 30 से अधिक वर्षों तक शानदार सेवा देने के बाद 1992 में सेवानिवृत्त हुए।
पुलिस सेवा से अहमद हसन की सेवानिवृत्ति उन्हें समाज के आम नागरिकों की सेवा करने के अपने मिशन को पूरा करने से नहीं रोक सकी। वह मुलायम सिंह यादव की धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित थे। 1994 में अहमद हसन समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। अपनी राजनीतिक क्षमता के चलते उनको कई बार पदों से नवाजा गया। उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधान परिषद विपक्ष के नेता, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश, बेसिक शिक्षा मंत्री बने। वर्तमान में विपक्ष के नेता उत्तर प्रदेश विधान परिषद थे। 19 फरवरी को लखनऊ से उनके निधन की खबर आयी तो न सिर्फ सपा नेताओं व कार्यकर्ताओं बल्कि जनपदवासियों में शोक की लहर दौड़ गई।