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Ambedkar Nagar News: बिना रीति रिवाज के दफन हुआ आमिर
Wed, 06 May 2026 01:14 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
Updated Wed, 06 May 2026 01:14 AM IST
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चार बच्चों और उनकी मां के हत्यारोपी आमिर को सोमवार रात सुपुर्द-ए-खाक करने के लिए खुदाई करता कर्
अंबेडकरनगर। चार मासूम बच्चों और उनकी मां की निर्मम हत्या के आरोपी आमिर का अंत भी उतना ही भयावह हुआ, जितना उसका अपराध। एनकाउंटर में मारे जाने के बाद उसे सहानुभूति नहीं मिली। जिंदगी भर जिन रिश्तों के बीच रहा, मौत के बाद वही रिश्ते उससे मुंह मोड़ गए। पुलिस की मौजूदगी में जौहरडीह शिवाला घाट पर उसे बिना किसी रस्म के दफनाया गया।
मीरानपुर के कसाईबाड़ा निवासी आमिर के शव को पोस्टमार्टम के बाद लेने से उसके अपने परिजनों ने इन्कार कर दिया। पिता जान मोहम्मद का साया पहले ही उठ चुका था। मां के अलावा तीन भाई हैं। तीन अविवाहित बहनें हैं और एक की मौत हो चुकी है। पूरा परिवार मांस बिक्री का काम करता है। मां, भाई-बहनों का भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद कोई उसे अपनाने को तैयार नहीं था।
भाई सैफी, चाचा ताज मोहम्मद समेत परिवार के अन्य लोगों ने अन्य परिजनों ने साफ कह दिया कि वे इस कलंक को अपने साथ नहीं जोड़ सकते। आसपास के लोगों में भी आक्रोश इतना था कि जिसने भी अंतिम संस्कार की हिम्मत दिखाई, उसके सामाजिक बहिष्कार तक की बातें होने लगीं। यह सिर्फ एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि समाज का कठोर निर्णय भी था।
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आखिरकार पुलिस के समझाने-बुझाने पर देर रात परिजन शव लेने को राजी तो हुए लेकिन उसे घर तक लाना भी मुनासिब नहीं समझा। जैसे वह पहले ही उनके दिलों से दफन हो चुका हो। पोस्टमार्टम हाउस से सीधे शहजादपुर के इमामबाग कब्रिस्तान ले जाया गया लेकिन उसे यहां भी जगह नहीं मिली।
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मीरानपुर के कसाईबाड़ा निवासी आमिर के शव को पोस्टमार्टम के बाद लेने से उसके अपने परिजनों ने इन्कार कर दिया। पिता जान मोहम्मद का साया पहले ही उठ चुका था। मां के अलावा तीन भाई हैं। तीन अविवाहित बहनें हैं और एक की मौत हो चुकी है। पूरा परिवार मांस बिक्री का काम करता है। मां, भाई-बहनों का भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद कोई उसे अपनाने को तैयार नहीं था।
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भाई सैफी, चाचा ताज मोहम्मद समेत परिवार के अन्य लोगों ने अन्य परिजनों ने साफ कह दिया कि वे इस कलंक को अपने साथ नहीं जोड़ सकते। आसपास के लोगों में भी आक्रोश इतना था कि जिसने भी अंतिम संस्कार की हिम्मत दिखाई, उसके सामाजिक बहिष्कार तक की बातें होने लगीं। यह सिर्फ एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि समाज का कठोर निर्णय भी था।
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आखिरकार पुलिस के समझाने-बुझाने पर देर रात परिजन शव लेने को राजी तो हुए लेकिन उसे घर तक लाना भी मुनासिब नहीं समझा। जैसे वह पहले ही उनके दिलों से दफन हो चुका हो। पोस्टमार्टम हाउस से सीधे शहजादपुर के इमामबाग कब्रिस्तान ले जाया गया लेकिन उसे यहां भी जगह नहीं मिली।