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High Court : हाईकोर्ट ने अपहरण और हत्या के आरोपी को आजीवन कारावास की सजा से किया बरी

Mon, 16 Jun 2025 07:15 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 16 Jun 2025 07:15 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या और अपहरण के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए दो आरोपियों को बरी कर दिया। खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया।

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The High Court acquitted the accused of kidnapping and murder from life imprisonment
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या और अपहरण के मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए दो आरोपियों को बरी कर दिया। खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता, न्यायमूर्ति समित गोपाल की अदालत ने नौशाद और अहसान की अपील स्वीकार करते हुए दिया है।

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सहारनपुर के देवबंद थाने में नदीम ने 10 अगस्त 2017 को अपने पांच वर्षीय बेटे मो.जैद के लापता होने की रिपोर्ट अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज कराई। उसी दिन बाद में नदीम ने एक और आवेदन दिया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसके साथ काम करने वाले अहसान, नौशाद ने उसके बेटे का अपहरण किया और हत्या कर दी।

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11 अगस्त, 2017 को कथित तौर पर नौशाद और अहसान की निशानदेही पर जैद का शव एक गन्ने के खेत से बरामद किया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण डूबने से दम घुटना बताया गया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को अपहरण और हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस आदेश को आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था। ऐसे में आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला पूरी होनी चाहिए। कोर्ट ने पाया कि शव की बरामदगी का साइट-प्लान कथित बरामदगी के दो दिन बाद तैयार किया गया था। इसमें खेत में पानी की मौजूदगी का कोई उल्लेख नहीं था, जबकि मृत्यु का कारण डूबना बताया गया था।

अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई सीसीटीवी फुटेज पर भरोसा नहीं किया जा सका। क्योंकि, जिसके घर कैमरा लगा था उससे पूछताछ नहीं की गई थी और अन्य औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं। अभियोजन पक्ष आरोपी के लिए अपराध करने का कोई स्पष्ट मकसद स्थापित नहीं कर सका। इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने सजा रद्द कर दी।

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