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कटरा में सटीक मुखबिरी पर भी आजाद को पकड़ने में फेल हो गई थी ब्रिटिश पुलिस

Tue, 27 Feb 2018 12:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Tue, 27 Feb 2018 12:58 AM IST
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The British police had failed to catch Azad even at Katra
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
इलाहाबाद। गुजरे 87 सालों में कटरा में सब कुछ बदल गया है। बची हैं तो कुछ भूली-बिसरी यादें।  बुजुर्गोँ की स्मृतियों में उन दिनों की पुरानी बातें अब भी जब-तब ताजा हो जाती हैं। कम लोग जानते होंगे कि 27 फरवरी 1931 को अलफ्रेड पार्क यानी कंपनी बाग में ब्रिटिश पुलिस की गोलियां खाकर शहीद होने से पहले चंद्रशेकर आजाद कटरा में एक प्रेस के पास बने अपने मित्र के भवन में भी मुखबिरी के चलते घेर लिए गए थे। तब श्रीदेवी मुसद्दी नामक क्रांतिकारी महिला ने नौकर के वेश में वहां से सुरक्षित निकाल कर उनकी जान बचाई थी।
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प्रयाग आने पर चंद्रशेखर आजाद के ठहरने का अड्डा कटरा में ही था। तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर को मुखबिरों के जरिए पता चल गया था कि आजाद कटरा में ही ठहरा करते हैं। वह कटरा में अपने क्रांतिकारी मित्र रामचंद्र मुसद्दी के घर पर रुकते थे। क्रांतिवीरों की टोली के लिए खाने-पीने का इंतजाम करने वाली उनकी पत्नी श्रीदेवी मुसद्दी साहसी महिलाओं में से एक थीं। इस खास घटना का उल्लेख आशा रानी वोहरा की पुस्तक‘क्रांतिकारी महिलाएं’में भी किया गया है। इस पुस्तक में अगस्त 1930 में रक्षाबंधन के दिन की उस घटना का जिक्र किया गया है, जब कटरा में रामचंद्र के घर ठहरे आजाद को ब्रिटिश पुलिस ने घेर लिया था। बड़े-बुजुर्गों की जुबानी डॉ. झरना भी उस घटना को साझा करती हैं। कहती हैं कि सुना है कि रक्षाबंधन की वजह से राखी बांधने के लिए कई बहनें भी आई थीं।
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पुलिस ने जब घर की तलाशी के लिए रामचंद्र से दरवाजा खुलवाने के लिए कहा तब श्रीदेवी मुसद्दी ने फटाफट आजाद को नौकर के पुराने कपड़े पहना दिए और मिठाई का पारात उनके सिर पर रखवा दिया था। पुलिस जैसे ही घर के भीतर पहुंची, श्रीदेवी ने नौकर के वेश में खड़े आजाद को फटकार लगाई । बोलीं कि जानते नहीं, आज रक्षाबंधन है। मुझे भाई के घर जाने में देर हो रही है। जल्दी पारात उठा और यहां से चल। ब्रिटिश पुलिस को शिनाख्त का मौका दिए वह पारात उठाए नौकर के साथ बाहर निकल गई थीं।
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कटरा में आजाद के ठहरने के प्रमाण मिलते हैं। वह शिशु प्रेस के पास अपने मित्र के घर रुका करते थे। वहीं क्रांतिकारियों की आंदोलन से जुड़ी बैठकें होती थीं। क्रांतिकारी जीवन पर शोध करने वाले संस्कृतिकर्मी डॉ. सुधांशु कुमार मालवीय ।
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