Prayagraj : प्रशासन के नोटिस पर बोले अविमुक्तेश्वरानंद- शंकराचार्य लिखने पर सुप्रीम कोर्ट से कोई रोक नहीं
Shankaracharya Avimukteshwaranand News : प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से शंकराचार्य का साक्ष्य देने के लिए जारी नोटिस के जवाब में मंगलवार को शंकराचार्य के अधिवक्ता डॉ. पीएन मिश्रा ने स्पष्ट किया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ही ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य हैं इसको लेकर कोई विवाद नहीं है। उनके नाम से रजिस्टर्ड वसीयत है। यह सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज है।
विस्तार
मौनी अमावस्या पर संगम नोज पर स्नान को लेकर प्रशासन और ज्योतिष्पीठ पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच शुरू हुआ विवाद अब शंकराचार्य की पदवी तक पहुंच गया है। मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्तूबर 2022 के एक आदेश का हवाला देते हुए अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी कर पूछा है कि खुद को शंकराचार्य कैसे घोषित कर लिया। इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से कहा गया कि उनके शंकराचार्य लिखने पर सुप्रीम कोर्ट से कोई रोक नहीं है।
प्रयागराज मेला प्राधिकरण की ओर से जारी यह नोटिस माघ मेला स्थित शंकराचार्य के शिविर के बाहर चस्पा किया गया है। इसमें कहा गया है कि ज्योतिष्पीठ में शंकराचार्य पद का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। जब तक सुप्रीम कोर्ट से अपील निस्तारित नहीं कर दी जाती या पट्टाभिषेक के संबंध में कोई अग्रिम आदेश नहीं दिया जाता, तब तक कोई भी धर्माचार्य शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेकित नहीं हो सकता।
नोटिस में कहा गया है कि माघ मेला में शिविर में लगाए गए बोर्ड पर आपने खुद को ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य घोषित किया है। आपके इस कृत्य से उच्चतम न्यायालय की अवहेलना दर्शित होती है। नोटिस में लिखा है कि 24 घंटे के अंदर यह स्पष्ट करें कि आप अपने नाम के आगे शंकराचार्य शब्द का उपयोग कैसे कर रहे हैं अथवा अपने को ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य रूप में कैसे प्रचारित कर रहे हैं।
इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से कहा गया कि नाम से पहले शंकराचार्य लिखने पर सुप्रीम कोर्ट से कोई रोक नहीं है और प्रशासन जिस आदेश का हवाला दे रहा है, उससे पहले उनका पट्टाभिषेक हो चुका था। शंकराचार्य की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता पीएन मिश्र ने उनका पक्ष रखते हुए बताया कि कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया गया था कि अब ब्रह्मलीन हो चुके स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के स्थान पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शंकराचार्य होंगे।
शंकराचार्य के अधिवक्ता पीएन मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहीं नहीं लिखा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं को शंकराचार्य नहीं लिख सकते या शंकराचार्य के रूप में अपने आप को प्रचारित-प्रसारित नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ही उनको शंकराचार्य कहा है। मेला प्रशासन ने जो नोटिस दिया है, वह सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक कार्रवाई में दखलअंदाजी है। इसके लिए अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से दिए गए तर्क
शंकराचार्य वह है, जिसे बाकी अन्य तीन पीठों के शंकराचार्य मान्यता देते हैं। दो पीठों द्वारका पीठ और शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य उन्हें शंकराचार्य कहते हैं।
पुरी के शंकराचार्य ने उनके बारे में कुछ नहीं कहा है। उन्होंने न तो यह कहा कि वह शंकराचार्य नहीं हैं और न ही यह कहा कि शंकराचार्य हैं। जब शृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्य यह कह रहे हैं कि हम शंकराचार्य हैं तो आखिर किस प्रमाण की आवश्यकता है कि हम शंकराचार्य हैं या नहीं? खुद सरकार ने महाकुंभ में एक पत्रिका छापी थी, उसमें उन्हें शंकराचार्य बताया था। क्या मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति तय करेंगे कि शंकराचार्य कौन है? यह अधिकार सिर्फ शंकराचार्यों के पास है कि शंकराचार्य कौन होगा
नोटिस देने गए कानूनगो को पहली बार लौटाया
मेला प्रशासन ने सोमवार देर रात को ही नोटिस जारी कर दिया था। नोटिस पर 19 जनवरी 2026 की तिथि अंकित है। सोमवार रात 12 बजे कानूनगो शंकराचार्य के शिविर में नोटिस देने पहुंचे। कानूनगो ने शंकराचार्य के शिष्यों से नोटिस लेने के लिए कहा लेकिन शिष्यों ने नोटिस लेने से मना कर दिया। मंगलवार सुबह कानूनगो ने दोबारा जाकर शिविर के बाहर नोटिस चस्पा कर दिया।
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