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Prayagraj News: एक फीडर पर तीन लाइनमैन के मानक, यहां दो-दो एक के भरोसे
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संगमनगरी में शहर से देहात तक बिजली व्यवस्था ध्वस्त है। इसके पीछे कई वजहें हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या लाइनमैनों की भारी कमी है। मानकों के अनुसार एक फीडर पर कम से कम तीन लाइनमैन होने चाहिए। लेकिन, हालत यह है कि यहां दो-दो फीडर एक-एक लाइनमैनों के हाथों में हैं। शहरी इलाकों में 55, जबकि गंगापार व यमुनापार में 45-45 उपकेंद्र हैं। शहरी क्षेत्र के उपकेंद्र से चार से छह तो देहात के उपकेंद्र से आठ से दस फीडर संचालित होते हैं। शहरी क्षेत्र के फीडर की लंबाई सात से आठ किलोमीटर और देहात के फीडरों की लंबाई 25 से 30 किलोमीटर की होती है। यह कर्मचारी रात-दिन काम करने के लिए मजबूर हैं।
शहर के एक तिहाई से अधिक इलाकों में ट्रिपिंग की समस्या है। कई इलाके अघोषित कटौती व लो वोल्टेज की समस्या से जूझ रहे हैं। ग्रामीण इलाकों की बिजली व्यवस्था और भी ध्वस्त है। उपभोक्ता अंधेरे में रात काटने और गर्मी में उमस भरा दिन गुजारने के लिए मजबूर हैं। लोग बिजली कार्यालयों के चक्कर काटते दिख रहे हैं। बता रहे हैं कि दस मिनट के काम के लिए उन्हें घंटों परेशान होना पड़ रहा है। देहात में ऐसे कई गांव हैं, जहां शाम सात बजे के बाद बिजली जाने के मतलब है कि रातभर अंधेरे में गुजारना।
इन लाइनमैनों पर काम का अतिरिक्त दबाव भी होता है। इससे कई बार इनकी रात की नींद भी नहीं पूरी हो पाती है। सारा दिन मरम्मत कार्य करने के बाद यह रात को भी फाल्ट सही करने के लिए दौड़ते हैं। यह लाइनमैन हादसे का भी शिकार हो जाते हैं, जिसके बाद उन्हें विभाग से कोई मदद भी नहीं मिलती है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 25-30 लाइनमैन हादसे में अपनी जान खो बैठते हैं या बुरी तरह से करंट से झुलस जाते हैं।
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शहर के एक तिहाई से अधिक इलाकों में ट्रिपिंग की समस्या है। कई इलाके अघोषित कटौती व लो वोल्टेज की समस्या से जूझ रहे हैं। ग्रामीण इलाकों की बिजली व्यवस्था और भी ध्वस्त है। उपभोक्ता अंधेरे में रात काटने और गर्मी में उमस भरा दिन गुजारने के लिए मजबूर हैं। लोग बिजली कार्यालयों के चक्कर काटते दिख रहे हैं। बता रहे हैं कि दस मिनट के काम के लिए उन्हें घंटों परेशान होना पड़ रहा है। देहात में ऐसे कई गांव हैं, जहां शाम सात बजे के बाद बिजली जाने के मतलब है कि रातभर अंधेरे में गुजारना।
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इन लाइनमैनों पर काम का अतिरिक्त दबाव भी होता है। इससे कई बार इनकी रात की नींद भी नहीं पूरी हो पाती है। सारा दिन मरम्मत कार्य करने के बाद यह रात को भी फाल्ट सही करने के लिए दौड़ते हैं। यह लाइनमैन हादसे का भी शिकार हो जाते हैं, जिसके बाद उन्हें विभाग से कोई मदद भी नहीं मिलती है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल 25-30 लाइनमैन हादसे में अपनी जान खो बैठते हैं या बुरी तरह से करंट से झुलस जाते हैं।
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