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शक्तिपीठ ललिता देवी : यमुना तट पर कटकर गिरी थी सती के हाथ की अंगुली, दर्शन से पूरी होती है भक्तों की मनोकामना

Fri, 24 Mar 2023 12:18 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 24 Mar 2023 12:18 AM IST
सार

संगमनगरी में महाशक्ति पीठों में एक मां ललिता देवी का पीठ जग विख्यात है। मान्यता है कि कभी शिव तांडव के समय सती के हाथ की अंगुलियां कटकर यहीं गिरी थीं। जहां सती के हाथ की अंगुली गिरी, वहीं मां ललिता का धाम भक्तों के मंगल का पर्याय बन गया।

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Shaktipeeth Lalita Devi: finger of Sati hand fell on the banks of Yamuna
Prayagraj News : चैत्र नवरात्र पर बृहस्पतिवार को ललिता देवी मंदिर में मां की आरती पूजन करते पुजारी। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

संगमनगरी में महाशक्ति पीठों में एक मां ललिता देवी का पीठ जग विख्यात है। मान्यता है कि कभी शिव तांडव के समय सती के हाथ की अंगुलियां कटकर यहीं गिरी थीं। जहां सती के हाथ की अंगुली गिरी, वहीं मां ललिता का धाम भक्तों के मंगल का पर्याय बन गया। नवरात्र में मां की नयनाभिराम झांकी के दर्शन के लिए भक्तों की अपार भीड़ लगती है। मां ललिता सौभाग्य की प्रदाता देवी हैं। भक्तिभाव से इनकी उपासना करने वालों की झोली कभी खाली नहीं रहती। 

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मीरापुर में स्थित मां ललिता का दरबार 51 शक्तिपीठों में से एक है। इनके दर्शन के लिए वैसे तो वर्ष भर भक्तों का रेला उमड़ता रहता है, लेकिन नवरात्रि में मां की झलक पाने के लिए हर कोई बेताब रहता है। नवरात्रि में नौ दिन मां ललिता की आराधना से लोग बिगड़ी बनाने के लिए दूर-दूर से आते हैं। मंदिर के पुजारी शिवमूरत मिश्र के मुताबिक इस मंदिर का रिश्ता महाभारत काल से भी है । वह बताते हैं कि लाक्षागृह से सुरंग के जरिए जान बचाकर निकलने के बाद पांडव सबसे पहले इसी ललिता धाम में पहुंचे थे। पांडवों ने यहां मंदिर परिसर कुएं का निर्माण कराया था, जिसे पांडुकूप कहा जाता है। पांडुकूप को फिलहाल जाली से ढंक दिया गया है। साथ ही जो भी भक्त माता के दर्शन करने को आते है तो वो इस कूप का भी दर्शन करते है ।

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मंदिर समिति के अध्यक्ष हरि मोहन वर्मा बताते हैं कि सती जब अपने पिता प्रजापति दक्ष द्वारा दामाद भगवान शिव का अपमान न सह सकीं तब उन्होंने नाराज होकर यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया था। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वह उनके शव को लेकर क्रोध में विचरण करने लगे। माता सती से भगवान शिव के मोह को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को काट दिया। चक्र से कटकर अलग होने पर जिन 51 स्थान पर सती के अंग गिरे, वह पावन स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। प्रयागराज इसी स्थान पर सती के हाथ की अंगुलियां गिरी थीं।

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