Research : सांसों के संपर्क में आते ही कैंसर का खतरा भांप लेगा सेंसर, वैज्ञानिकों को शोध में मिली सफलता
आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने लंंबे समय से रिसर्च के बाद यह सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने ऐसा सेंसर तैयार किया है, जो सांसों के संपर्क में आते ही कैंसर व कई दूसरी गंभीर बीमारियों के लिए जिम्मेदार रसायन परफ्लूरो ऑक्टेनोइक एसिड (पीएफओए) का पता लगा लेगा। वैज्ञानिकों ने इस सेंसर को ‘इलेक्ट्रोकेमिकल प्रॉपर्टीज ऑफ 2-डी क्वासी क्रिस्टल’ नाम दिया है।
विस्तार
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि), आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने ऐसा सेंसर तैयार किया है, जो सांसों के संपर्क में आते ही कैंसर व कई दूसरी गंभीर बीमारियों के लिए जिम्मेदार रसायन परफ्लूरो ऑक्टेनोइक एसिड (पीएफओए) का पता लगा लेगा। वैज्ञानिकों ने इस सेंसर को ‘इलेक्ट्रोकेमिकल प्रॉपर्टीज ऑफ 2-डी क्वासी क्रिस्टल’ नाम दिया है।
क्वासी क्रिस्टल एक अद्भुत ज्यामितीय संरचना है, जिसकी खोज इस्राइल के वैज्ञानिक डैन शेचमैन ने 1882 में की थी। यह शोध 1984 में प्रकाशित हुआ था। शुरुआत में दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों ने इस शोध का नकार दिया था। लेकिन, लंबे समय तक चले विवाद के बाद इसी शोध के लिए शेचमैन को 2011 में रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया।
आगे चलकर क्वासी क्रिस्टल का इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण शोध में किया गया। अब इससे एक ऐसा सेंसर तैयार किया गया है, जो सांसों के संपर्क में आते ही मानव शरीर में मौजूद कैंसरकारी रसायन पीएफओए की सटीक मात्रा का पता लगा लेगा। यह शोध जर्नल ऑफ अमेरिकन केमिकल सोसाइटी में प्रकाशन के लिए भेजा गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक चिकित्सा क्षेत्र में यह शोध क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।
दुनिया के शीर्ष दो फीसदी वैज्ञानिकों में शामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञानी प्रो. टीपी यादव ने बताया कि सेंसर की मैटेरियल डिजाइन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में ही तैयार की गई है। आईआईटी खड़गपुर के डॉ. चंद्रशेखर तिवारी ने सेंसर पर काम किया और आईआईटी बीएचयू के प्रो. एनके मुखोपाध्याय ने कुछ दूसरे प्रयोग किए। सैपियंस यूनिवसिर्टी, ब्राजील के वैज्ञानिक प्रो. डोगलस ने इसका सैद्धांतिक विश्लेषण किया और इस नतीजे पर आ पहुंचे।
पांच तत्वों से तैयार किया गया सेंसर
इलेक्ट्रोकेमिकल प्रॉपर्टीज ऑफ 2-डी क्वासी क्रिस्टल एल्युमिनियम, कोबाल्ट, आयरन, निकिल व कॉपर को मिलाकर बना है। प्रो. यादव के अनुसार शीटनुमा क्वासी क्रिस्टल की सतह से सोडियम हाइड्रॉक्साइड के जरिये एल्यूनिमियम को हटाया गया। इसके बाद रिएक्टिविटी कई गुना बढ़ गई और यह सेंसर में तब्दील हो गया। अपनी अद्भुत ज्यामितीय संरचना के कारण यह सेंसर काफी प्रभावशाली है।
डोपामिन सेंसर भी बना चुकी यही टीम
इसके पहले वैज्ञानिकों की यही टीम मानव मस्तिष्क से निकले डोपामिन रसायन को चंद सेकेंड में परख लेने वाला सेंसर भी बना चुकी है। यह सेंसर बताता है कि डोपामिन का स्राव हुआ है या नहीं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसका अधिक स्राव इस कदर उत्तेजित कर देता है लोग आत्मघाती कदम उठाने से लेकर गंभीर अपराध तक कर बैठते हैं। कुछ माह पहले ही यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल अमेरिकन केमिकल सोसाइटी में प्रकाशित हो चुका है।
ये हैं पीएफओए के खतरे
कैंसर: पीएफओए के लंबे समय तक संपर्क में रहने से किडनी कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। पीएफओए के संपर्क से जुड़े अन्य कैंसरों में प्रोस्टेट और वृषण कैंसर शामिल हैं।
प्रजनन प्रभाव: पीएफओए गर्भवती महिलाओं में प्रजनन क्षमता में कमी और उच्च रक्तचाप में वृद्धि का कारण बन सकता है।
विकास संबंधी प्रभाव: पीएफओए के संपर्क से जन्म के समय कम वजन, हड्डियों में भिन्नता या बच्चों के व्यवहार में बदलाव हो सकता है।
प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रभाव: पीएफओए शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता को कम करता है। इससे टीके का असर घट सकता है।
हार्मोनल प्रभाव: पीएफओए शरीर के प्राकृतिक हार्मोन में हस्तक्षेप कर सकता है।
कोलेस्ट्रॉल व यूरिक एसिड: पीएफओए के संपर्क से कोलेस्ट्रॉल का स्तर और मोटापे का खतरा बढ़ सकता है।
लीवर पर प्रभाव: पीएफओए के संपर्क में आने से वयस्कों में लीवर एंजाइम बढ़ सकते हैं।