तालिबान का खूंखार चेहरा देख अफगानिस्तान से लौटे इंजीनियर सहित दो लोग अब भी दहशत में
तालिबान का खूंखार चेहरा देख अफगानिस्तान से लौटे प्रतापगढ़ के इंजीनियर सहित दो लोग अब भी सदमे में हैं। तालिबान का खौफ उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा है।
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लालगंज कोतवाली के बाबूगंज कुंवर का पुरवा निवासी अशोक कुमार सिंह ने एमसीए की डिग्री हासिल करने के बाद दिल्ली की एक कंपनी में बतौर आईटी इंजीनियर काम शुरू किया था। साल 2012 वह काबुल में अमेरिकन आर्मी के बेस कैंप में बतौर आईटी इंजीनियर काम करने लगे। 2015 तक नौकरी करने के बाद घर आ गए। वर्ष 2017 में फिर नौकरी करने काबुल गए। 14 अगस्त को तालिबानियों के काबुल पर हमले के समय अशोक काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिकी सेना के बेस कैंप में रुके थे। उनके साथ करीब 40 लोग थे। इसमें पांच भारतीय, 15 ब्रिटिश व 20 अमेरिकी नागरिक थे। तालिबान के पहुंचने से पहले ही अशोक की टीम को कैंप खाली करने को कहा गया था।
15 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर पूरी तरह कब्जा कर लिया। तालिबान के हमले के चलते हर ओर भगदड़ मची रही। लोग अपनी जान बचाने के लिए परिवार के सदस्यों को छोड़कर भाग रहे थे। हर ओर चीखपुकार और कोहराम मचा था। लोग तालिबानी लड़ाकों से बचना चाहते थे। सिविलियन एयरपोर्ट के भीतर भी लोग जान बचाने के लिए हवाई जहाज में छिप रहे थे। तालिबान के एयरबेस पर पूरी तरह कब्जा करने से पहले ही उनकी टीम को काबुल से निकालकर कतर भेजा गया। वहां से 140 सदस्यों को दुबई के दोहा अमेरिकी एयरबेस ले जाया गया। जहां उन लोगों की कोरोना की जांच हुई। वहां से 17 अगस्त को भोर में कुवैत पहुंचाया गया। कुछ घंटों तक रुकने के बाद उन्हें दिल्ली भेजा गया। वहां से अशोक वंदे भारत ट्रेन पकड़कर प्रयागराज पहुंचे। जहां पहले से ही भाई प्रवीण सिंह मौजूद थे। दोनों भाई गले मिले और घर के लिए रवाना हो गए। अशोक सिंह को सकुशल सामने देख परिजनों की आंखों से आंसू निकलने लगे।
शहर के सब्जी मंडी निवासी अरसी भी अफगानिस्तान के एयरपोर्ट की सुरक्षा में तैनात नेटो टीम के सदस्य थे। हालांकि वह बकरीद पर अवकाश लेकर घर आ गए। एक सप्ताह का अवकाश समाप्त होने के बाद वहां के हालात को देखते हुए अरसी ने अधिकारियों से संपर्क किया। उन्हें एक माह तक रुकने के लिए कहा गया। अभी भी उनकी टीम के सदस्य वहीं फंसे हुए हैं। मौजूदा समय में सभी को कतर एयरबेस पर रोका गया है।