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High Court : साबित क्रूरता तलाक का मजबूत आधार, महिला सिपाही के पति की अपील खारिज

Fri, 29 Dec 2023 12:39 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 29 Dec 2023 12:39 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला सिपाही के पति की उस अर्जी को खारिज कर दिया है जिसमें उसने वैवाहिक संबंधों को बहाल करने की गुहार लगाई थी। कोर्ट ने कहा क्रूरता तलाक का मजबूत आधार है। याची पर लगाया गया क्रूरता का आरोप साबित हो चुका है। इसलिए मामले में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।

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ruelty proved to be a strong ground for divorce, appeal of woman constable's husband against divorce rejected
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

महिला सिपाही के पति की वैवाहिक संबंधों की बहाली की मांग मानने से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि क्रूरता तलाक का मजबूत आधार है। मौजूदा मामले में पति पर क्रूरता का आरोप साबित है, इसलिए अदालत मामले में हस्तक्षेप नही कर सकती।

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यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद की खंडपीठ ने हेम सिंह उर्फ टिंचू की ओर से पारिवारिक न्यायालय द्वारा पत्नी की ओर से क्रूरता के आधार पर दाखिल तलाक की अर्जी को स्वीकार करने वाले आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए दिया।
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मामला इटावा का है। याची हेमसिंह की शादी पुलिस विभाग में तैनात महिला सिपाही से हुई थी। शादी के बाद वह पत्नी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने लगा। पैसे की मांग पूरी न होने पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाने लगा। जिससे परेशान महिला सिपाही ने पति पर क्रूरता के आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी इटावा के पारिवारिक न्यायालय में दाखिल की थी।

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सुनवाई के दौरान सिपाही के ससुराली जनों ने ही उसके द्वारा पति पर लगाए गए आरोपों को सही बताया था। पारिवारिक न्यायालय ने महिला सिपाही की अर्जी मंजूर करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी। इस आदेश के खिलाफ पति हेमसिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दलील दी गई कि याची द्वारा वैवाहिक संबंधों में किसी भी प्रकार की क्रूरता नही की गई है, याची अपनी पत्नी के साथ प्रेम पूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता है।

कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि क्रूरता साबित हो जाने के बाद तलाक बहाली का आदेश तभी दिया जा सकता है जब अदालत इस बात से संतुष्ट हो जाए कि पक्षकारों का आचरण एक दूसरे के प्रति ठीक रहेगा। लेकिन मौजूदा मामले में क्रूरता पूरी तरह साबित है। इसलिए निचली अदालत पारित आदेश पूरी तरह सही है।

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