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Prayagraj News: देशज ज्ञान का पुनर्जीवन पारिस्थितिक अस्तित्व व सामाजिक न्याय के लिए जरूरी
Sun, 13 Sep 2026 02:08 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Sun, 13 Sep 2026 02:08 AM IST
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ईश्वर शरण पीजी कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के समापन पर बोलते हुए मुख्य अत
ईश्वर शरण पीजी कॉलेज में देशज ज्ञान परंपराओं पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का शनिवार को समापन हुआ।मुख्य अतिथि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की कार्यकारी परिषद की सदस्य व समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष प्रो. श्वेता प्रसाद ने कहा कि देश के अकादमिक जगत को स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की पुनर्खोज के लिए आदिवासी जीवन, संस्कृति और मूल्यबोध के स्तर तक पहुंचकर उनसे संवाद करना होगा।
गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूल रूप से देशज ज्ञान परंपरा ही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी स्वदेशी ज्ञान परंपरा और उसकी निर्मिति को शिक्षा व्यवस्था, पाठ्यक्रम और शिक्षण का हिस्सा बनाने की परिकल्पना की गई है।
कॉलेज के प्राचार्य प्रो. आनंद शंकर सिंह ने कहा कि देशज ज्ञान परंपरा को केवल सरकारी डाटाबेस, विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं या आधुनिक तकनीक के जरिये पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उस धरातल तक जाना होगा जहां यह ज्ञान पैदा हुआ और संरक्षित रहा।
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देश-विदेश के विशेषज्ञों ने रखे शोधपत्र
-सेमिनार के दूसरे दिन विभिन्न प्लेनरी सत्रों में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। वहीं शोधार्थियों ने 150 शोधपत्रों का वाचन किया। इसके बाद राजनीति विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अंकित पाठक ने रिपोर्ट, संचालन प्राचीन इतिहास, संस्कृति व पुरातत्व विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. रागिनी राय और धन्यवाद ज्ञापन जनजातीय अध्ययन केंद्र के संयोजक डॉ. विकास कुमार ने किया।
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गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूल रूप से देशज ज्ञान परंपरा ही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भी स्वदेशी ज्ञान परंपरा और उसकी निर्मिति को शिक्षा व्यवस्था, पाठ्यक्रम और शिक्षण का हिस्सा बनाने की परिकल्पना की गई है।
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कॉलेज के प्राचार्य प्रो. आनंद शंकर सिंह ने कहा कि देशज ज्ञान परंपरा को केवल सरकारी डाटाबेस, विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं या आधुनिक तकनीक के जरिये पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उस धरातल तक जाना होगा जहां यह ज्ञान पैदा हुआ और संरक्षित रहा।
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देश-विदेश के विशेषज्ञों ने रखे शोधपत्र
-सेमिनार के दूसरे दिन विभिन्न प्लेनरी सत्रों में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। वहीं शोधार्थियों ने 150 शोधपत्रों का वाचन किया। इसके बाद राजनीति विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अंकित पाठक ने रिपोर्ट, संचालन प्राचीन इतिहास, संस्कृति व पुरातत्व विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. रागिनी राय और धन्यवाद ज्ञापन जनजातीय अध्ययन केंद्र के संयोजक डॉ. विकास कुमार ने किया।