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High Court : सहायक प्रोफ़ेसर की पदोन्नति रोकने पर बीएचयू VC से जवाब तलब, प्रस्ताव के बावजूद नहीं किया प्रमोशन
Fri, 27 Sep 2024 06:04 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 27 Sep 2024 06:04 PM IST
सार
याची की नियुक्ति सितंबर 2017 में हुई। वर्ष 2020 उन्हें सहायक प्रोफेसर, स्टेज -2 के पद पर पदोन्नत किया गया। अचानक 13 फरवरी 2021 को बीएचयू प्रशासन ने बताया कि सीएएस के तहत सहायक प्रोफेसर, स्टेज -2 के पद पर पदोन्नति 10.10.2017 को तय की गई है। याची ने इसके खिलाफ याचिका दाखिल की है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कुलपति से व्यक्तिगत हलफनामा तलब किया हैं। पूछा है कि 04 जून 2021 को कार्यपरिषद से प्रस्ताव पारित होने के बावजूद आयुर्वेद संकाय में तैनात सहायक प्रोफेसर डा. सुशील कुमार दुबे की पदोन्नती क्यों नही की जा रही है। यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने डॉ सुशील कुमार दुबे की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
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याची की नियुक्ति सितंबर 2017 में हुई। वर्ष 2020 उन्हें सहायक प्रोफेसर, स्टेज -2 के पद पर पदोन्नत किया गया। अचानक 13 फरवरी 2021 को बीएचयू प्रशासन ने बताया कि सीएएस के तहत सहायक प्रोफेसर, स्टेज -2 के पद पर पदोन्नति 10.10.2017 को तय की गई है। याची ने इसके खिलाफ याचिका दाखिल की है।
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याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि कार्यकारी परिषद की ओर से वर्ष 2021 में याची को सहायक प्रोफेसर, स्टेज- II से सहायक प्रोफेसर, स्टेज- III के पद पर पदोन्नत करने का निर्णय लिया गया था। इसके बावजूद, 3 साल बाद भी कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव को विश्वविद्यालय अधिकारियों द्वारा आज तक लागू नहीं किया गया है।
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वहीं, बीएचयू की ओर से अधिवक्ता राहुल अग्रवाल ने दलील दी कि यद्यपि कार्यकारी परिषद का दिनांक 04 जून 2021 का प्रस्ताव मौजूद है, लेकिन इस मामले को हल करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिनांक 23 फरवरी 2021 के पत्र के आलोक में पुनर्विचार किया जाना आवश्यकता है।
कोर्ट ने कहा कि अदालत आश्चर्यचकित है कि कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव की तिथि से तीन वर्ष बाद भी प्रस्ताव का क्रियान्वयन क्यों नही किया जा रहा। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया, यह कुलपति द्वारा वर्ष 2021 में लिए गए कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव के क्रियान्वयन को रोकने की एक जानबूझकर की गई कार्रवाई है। लिहाजा कुलपति एक हफ्ते के भीतर हलफनामे पर प्रस्ताव के क्रियान्वयन न होने का कारण स्पष्ट करे। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्तूबर को होगी।