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रेप पीड़िता को 24 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति नहीं
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 03 Nov 2017 01:54 AM IST
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delhi court
हाईकोर्ट ने नैनी जेल में बंद रेप पीड़िता को 24 सप्ताह का गर्भ गिराने की इजाजत देने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि नियमानुसार पीड़िता की मानसिक स्थिति और जीवन पर खतरे के मद्देनजर 20 सप्ताह तक का गर्भ ही गिराने की अनुमति दी जा सकती है। पीड़िता के मामले में डाक्टरों की टीम ने राय दी है कि उसे गर्भ रखने में किसी प्रकार का खतरा नहीं है और न ही उसके गर्भ में पल रहे भ्रूण में कोई विकृति पाई गई है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि पीड़ित महिला को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जाए ताकि वह स्वस्थ शिशु को जन्म दे सके।
याचिका पीड़िता की मां की ओर से दाखिल की गई थी। इस पर न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल और न्यायमूर्ति अजय भनोट की खंडपीठ ने सुनवाई की। याची के अधिवक्ता बृजराज का कहना था कि 20 मई 2017 को उसके साथ रेप हुआ था। पुलिस ने इसकी प्राथमिकी दर्ज नहीं की। इसके बाद 12 जून 2017 को उसे हत्या के एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया हालांकि वह प्राथमिकी में नामजद नहीं है। जेल में ही उसे गर्भ का पता चला। उसने जेल अधीक्षक के मार्फत सीजेएम को अर्जी देकर गर्भ गिराने की अनुमति मांगी थी। 17 अगस्त को उसकी अर्जी खारिज हो गई।
इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने सीएमओ की अध्यक्षता में डाक्टरों की टीम गठित कर रिपोर्ट मांगी। मेडिकल टर्निमेशन ऑफ प्रिगनेंसी एक्ट 1971 के तहत राय मांगी थी। मेडिकल टीम ने रिपोर्ट दी कि 22 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति नहीं जा सकती है। इसका ऑपरेशन स्वरूपरानी अस्पताल में ही हो सकता है। कोर्ट ने स्वरूपरानी अस्पताल के डाक्टरों से भी रिपोर्ट मांगी। वहां डाक्टरों की रिपोर्ट में कहा गया कि गर्भ रखने से पीड़िता को किसी प्रकार का खतरा नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि गर्भ रखने से महिला को कोई नुकसान नहीं है और बच्चे में कोई विकलांगता नहीं है तो गर्भ गिराने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
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याचिका पीड़िता की मां की ओर से दाखिल की गई थी। इस पर न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल और न्यायमूर्ति अजय भनोट की खंडपीठ ने सुनवाई की। याची के अधिवक्ता बृजराज का कहना था कि 20 मई 2017 को उसके साथ रेप हुआ था। पुलिस ने इसकी प्राथमिकी दर्ज नहीं की। इसके बाद 12 जून 2017 को उसे हत्या के एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया हालांकि वह प्राथमिकी में नामजद नहीं है। जेल में ही उसे गर्भ का पता चला। उसने जेल अधीक्षक के मार्फत सीजेएम को अर्जी देकर गर्भ गिराने की अनुमति मांगी थी। 17 अगस्त को उसकी अर्जी खारिज हो गई।
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इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने सीएमओ की अध्यक्षता में डाक्टरों की टीम गठित कर रिपोर्ट मांगी। मेडिकल टर्निमेशन ऑफ प्रिगनेंसी एक्ट 1971 के तहत राय मांगी थी। मेडिकल टीम ने रिपोर्ट दी कि 22 सप्ताह का गर्भ गिराने की अनुमति नहीं जा सकती है। इसका ऑपरेशन स्वरूपरानी अस्पताल में ही हो सकता है। कोर्ट ने स्वरूपरानी अस्पताल के डाक्टरों से भी रिपोर्ट मांगी। वहां डाक्टरों की रिपोर्ट में कहा गया कि गर्भ रखने से पीड़िता को किसी प्रकार का खतरा नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि गर्भ रखने से महिला को कोई नुकसान नहीं है और बच्चे में कोई विकलांगता नहीं है तो गर्भ गिराने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
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