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प्रयागराजः भारत-जर्मनी के शिक्षण संस्थान बिग डेटा पर साथ करेंगे शोध
Tue, 02 Apr 2019 02:28 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 02 Apr 2019 02:28 AM IST
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allahabad
- फोटो : प्रयागराज
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय समेत भारत के पांच अग्रणी शिक्षण संस्थान और जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्र्सिटी बिग डेटा पर साथ मिलकर शोध करेंगे। सोमवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों ने समझौतापत्र पर अपने हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत दोनों देशों के शिक्षण संस्थान बिग डाटा तकनीकी का प्रयोग जैवीय शोध में करेंगे।
हालांकि, यह करार वर्ष 2018 में ही हो चुका था, लेकिन सोमवार को इविवि में द्विपक्षीय विस्तृत समझौता ज्ञापन में में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से रजिस्ट्रार प्रो. एनके शुक्ला, आईआईटी मद्रास से प्रो. कार्तिकेय रमन, आईआईटी कानपुर से प्रो. शलभ, आईआईटी गुवाहाटी से प्रो. बिप्लव बोस, जेएनयू से प्रो. शानदार अहमद एवं हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय जर्मनी से प्रो. डिटर हरमन ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान संयोजक प्रो. रामेंद्र कुमार सिंह भी मौजूद रहे।
इस करार के तहत प्रतिष्ठित भारतीय एवं जर्मन वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हर साल 20 पीएचडी प्रोजेक्ट एवं चार पोस्ट डॉक्टेरल प्रोजेक्ट इन उच्च शिक्षण संस्थानों के बीच प्रारंभ होंगे। इसके तहत भारत में इन संस्थानों से 20 छात्र पहले वर्ष भारत में ही शोध करेंगे। इसके बाद अगले दो वर्षों तक हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में रिसर्च करेंगे और फिर चौथे वर्ष अपने संस्थान में लौटकर पीएचडी पूरी करेंगे। इसी के मद्देनजर सोमवार से इविवि के सीनेट हॉल में ‘बिग डेटा रिसर्च इन द बायोसाइंस-2019’ विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत की गई।
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बिग डेटा पर रिसर्च न सिर्फ विज्ञान के छात्र-छात्राओं, बल्कि आम जनमानस के लिए भी फायदेमंद होगा। हालांकि, रिसर्च पूरा होने और इसे जमीनी तौर पर लागू करने में कुछ वर्षों का समय लगेगा, लेकिन रिसर्च की सफलता के बाद बिग डाटा स्वास्थ्य, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समेत कई क्षेत्रों में मील का पत्थर साबित होगा।
कराकर पर हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि बिग डेटा के जरिये डीएनए सीक्वेंस से पता लगाया जा सकेगा कि किसी व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी हो सकती है। ऐसे में संबंधित व्यक्ति को गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी काम हो रहा है। ऐसे कंप्यूटर बनाए जा रहे हैं जो मनुष्य के दिमाग को पढ़ने में सक्षम होंगे और मनुष्य की समान ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी भारत और जर्मनी के शिक्षण संस्थान साथ मिलकर शोध करेंगे ताकि भारत को भी इसका लाभ मिल सके।
इविवि के प्रो. रामेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि एचआईवी बीमारी को लेकर भी बिग डेटा में बड़ा काम किए जाने की संभावना है। बिग डेटा से यह भी पता लगाया जा सकता है कि अलग-अलग क्षेत्रों के लोग किस तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं, बीमारी की वजह क्या है। खानपान या क्षेत्र का वातावरण बीमार का कारण बन रहा है। हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो. डिटर हरमन ने बताया कि कैंसर की बीमारी से निपटने में भी बिग डेटा काफी उपयोगी है। बिग डेट के जरिये ही पता लगाया जा रहा है कि एक खास तरह की हरी मिर्च भी कैंसर की वजह बन रही है। बिग डेटा कई गंभीर बीमारियों की रोकथाम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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हालांकि, यह करार वर्ष 2018 में ही हो चुका था, लेकिन सोमवार को इविवि में द्विपक्षीय विस्तृत समझौता ज्ञापन में में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से रजिस्ट्रार प्रो. एनके शुक्ला, आईआईटी मद्रास से प्रो. कार्तिकेय रमन, आईआईटी कानपुर से प्रो. शलभ, आईआईटी गुवाहाटी से प्रो. बिप्लव बोस, जेएनयू से प्रो. शानदार अहमद एवं हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय जर्मनी से प्रो. डिटर हरमन ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान संयोजक प्रो. रामेंद्र कुमार सिंह भी मौजूद रहे।
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इस करार के तहत प्रतिष्ठित भारतीय एवं जर्मन वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हर साल 20 पीएचडी प्रोजेक्ट एवं चार पोस्ट डॉक्टेरल प्रोजेक्ट इन उच्च शिक्षण संस्थानों के बीच प्रारंभ होंगे। इसके तहत भारत में इन संस्थानों से 20 छात्र पहले वर्ष भारत में ही शोध करेंगे। इसके बाद अगले दो वर्षों तक हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में रिसर्च करेंगे और फिर चौथे वर्ष अपने संस्थान में लौटकर पीएचडी पूरी करेंगे। इसी के मद्देनजर सोमवार से इविवि के सीनेट हॉल में ‘बिग डेटा रिसर्च इन द बायोसाइंस-2019’ विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत की गई।
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बिग डेटा पर रिसर्च न सिर्फ विज्ञान के छात्र-छात्राओं, बल्कि आम जनमानस के लिए भी फायदेमंद होगा। हालांकि, रिसर्च पूरा होने और इसे जमीनी तौर पर लागू करने में कुछ वर्षों का समय लगेगा, लेकिन रिसर्च की सफलता के बाद बिग डाटा स्वास्थ्य, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समेत कई क्षेत्रों में मील का पत्थर साबित होगा।
कराकर पर हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि बिग डेटा के जरिये डीएनए सीक्वेंस से पता लगाया जा सकेगा कि किसी व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी हो सकती है। ऐसे में संबंधित व्यक्ति को गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी काम हो रहा है। ऐसे कंप्यूटर बनाए जा रहे हैं जो मनुष्य के दिमाग को पढ़ने में सक्षम होंगे और मनुष्य की समान ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी भारत और जर्मनी के शिक्षण संस्थान साथ मिलकर शोध करेंगे ताकि भारत को भी इसका लाभ मिल सके।
इविवि के प्रो. रामेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि एचआईवी बीमारी को लेकर भी बिग डेटा में बड़ा काम किए जाने की संभावना है। बिग डेटा से यह भी पता लगाया जा सकता है कि अलग-अलग क्षेत्रों के लोग किस तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं, बीमारी की वजह क्या है। खानपान या क्षेत्र का वातावरण बीमार का कारण बन रहा है। हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो. डिटर हरमन ने बताया कि कैंसर की बीमारी से निपटने में भी बिग डेटा काफी उपयोगी है। बिग डेट के जरिये ही पता लगाया जा रहा है कि एक खास तरह की हरी मिर्च भी कैंसर की वजह बन रही है। बिग डेटा कई गंभीर बीमारियों की रोकथाम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।