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प्रतापगढ़ सीट पर सवर्णों का ही रहा दबदबा 

Mon, 08 Apr 2019 01:31 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़ Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 08 Apr 2019 01:31 AM IST
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Pratapgarh seat is only of the upper castes
राजा भैय्या
प्रतापगढ़ संसदीय सीट पर अब तक सवर्णों का ही दबदबा रहा है। वंशवाद की सियासत के साथ यहां लोकसभा के चुनाव में सवर्णों का सिक्का चला। सबसे ज्यादा यहां से राजपूत सांसद हुए। शुरुआत में दो बार यहां से ब्राह्मण सांसद चुने गए। सिर्फ एक बार गैर सवर्ण यहां से सांसद बन सका। जिले की राजनीति में मजबूत पकड़ को देखते हुए इस सीट पर तकरीबन सभी पार्टियां सवर्णों पर ही दांव खेलती हैं। 
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जिले में सवर्ण जाति के लोग ही सांसद चुने जाते रहे। राजघरानों से यदि सीट बाहर गई तो भी सवर्णों का ही कब्जा रहा। सवर्ण बिरादरी के लोगों के प्रभाव को देखते हुए सभी राजनैतिक दल उन्हें ही अपना प्रत्याशी बनाते रहे। 1952 और 1957 का चुनाव लगातार कांग्रेस के टिकट पर मुनीश्वरदत्त उपाध्याय ने जीता। इसके बाद कांग्रेस को मात देने के लिए जनसंघ ने जिले में अपना पैर फैलाया। उसने भी क्षत्रिय राजा अजीत प्रताप सिंह को मैदान में उतारा।
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1962 में जनसंघ के टिकट पर जिले में बड़ा प्रभाव रखने वाले राजा अजीत प्रताप सिंह ने कांग्रेस का विजय रथ रोका। हालांकि वह कांग्रेस उम्मीदवार पर 23,684 वोटों से ही जीत दर्ज कर सके थे। 1967, 1971 में हुए चुनाव फिर कांग्रेस के राजा दिनेश सिंह जीते। 1977 के चुनाव में पूरे देश के साथ जिले में भी कांग्रेस के विरोध में लहर चल रही थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इमरजेंसी लगाने से जनता उन्हें कुर्सी से बेदखल करने का फैसला कर चुकी थी। इस चुनाव में लोगों ने कांग्रेस के विरोध में फैसला सुनाया और जनता पार्टी समर्थित भारतीय लोकदल के पिछड़ी जाति के उम्मीदवार रूपनाथ सिंह यादव को 1,49,320 वोटों से जिताया। रूपनाथ को 2,06,339 और कांग्रेस के दिनेश सिंह को मात्र 57,019 वोट ही मिल सके थे। पहली बार पिछड़ी जाति के रूपनाथ यादव को सांसद बनने का मौका मिला था।
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इसके बाद 1980 में चुनाव हुआ तो कांग्रेस आई के अजीत प्रताप सिंह जीते। दूसरे नंबर पर जय सिंह थे, जबकि राजा दिनेश सिंह तीसरे स्थान पर खिसक गए थे। इस चुनाव में सभी दलों ने सवर्ण कार्ड खेला था। 1984 में इंदेिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की जो लहर आई थी उसमें सभी विरोधी उड़ गए। जिले के लोकसभा चुनाव में संवेदना की यह ऐतिहासिक लहर थी। इस चुनाव में भी सभी प्रमुख दलों ने सवर्ण कार्ड खेला। कांग्रेस के राजा दिनेश प्रताप सिंह को 2,79,354 वोट मिले। राजा दिनेश इस चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी लोकदल के रामदेव से 2,32,507 वोटों से जीते थे।


इस जीत का रिकार्ड आज तक बरकरार है। न तो राम लहर इसे तोड़ सकी और न ही आरक्षण व बोफोर्स दलाली का मुद्दा। बाद के चुनाव विकास, गुंडागर्दी जैसे स्थानीय मुद्दों पर हुए। उनमें सिर्फ मामूली अंतर से हार-जीत हो सकी। वैसे प्रमुख दल लोकसभा चुनाव में सवर्णों के प्रभाव को देखते हुए उन्हें ही अपना प्रत्याशी बनाते चले आ रहे हैं। ताकि उनकी पार्टी को कामयाबी मिल सके। एक बार सपा व बसपा मुस्लिम कार्ड खेल चुकी हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में सपा ने पिछड़ी जाति पर दांव लगाया, लेकिन उसे चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा। जिले में सवर्णों के प्रभाव को देखते हुए सभी प्रमुख सियासी दल चुनाव के दौरान राजघरानों के अलावा ब्राह्मण या क्षत्रिय समाज के प्रत्याशियों पर अधिक भरोसा जताते दिखते हैं।
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