फूलपुर लोकसभा : नेहरू की सीट पर जनाधार खोती कांग्रेस, जीत के लिए करना होगा संघर्ष
पं. नेहरू का आवास आनंद व स्वराज भवन स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहा तो आजादी के बाद भी यह लंबे से कांग्रेस के चरमोत्कर्ष का गवाह बना। दोनों भवन फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जहां से पं. नेहरू तीन बार सांसद चुने गए। इसके बाद उनकी बहन विजया लक्ष्मी पंडित भी दो बार सांसद चुनी गईं।
विस्तार
देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू समेत कई बड़े नेताओं की कर्मस्थली रही प्रयागराज में कांग्रेस अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पं. नेहरू की फूलपुर सीट पर 1977 में हार का सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा। इसके बाद सिर्फ 1984 में कांग्रेस के रामपूजन पटेल को ही जीत मिल पाई थी।
पं. नेहरू का आवास आनंद व स्वराज भवन स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहा तो आजादी के बाद भी यह लंबे से कांग्रेस के चरमोत्कर्ष का गवाह बना। दोनों भवन फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जहां से पं. नेहरू तीन बार सांसद चुने गए। इसके बाद उनकी बहन विजया लक्ष्मी पंडित भी दो बार सांसद चुनी गईं। पं. नेहरू की पुत्री और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भले ही रायबरेली चली गईं लेकिन उन्होंने राजनीति के उतार-चढ़ाव को यहीं पर सीखा।
पं. नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे नेता देने वाली फूलपुर सीट पर कांग्रेस अब जमानत बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। 1951 से 1967 तक कांग्रेस को इस सीट पर लगातार जीत हासिल हुई लेकिन 1977 में पार्टी के रामपूजन पटेल बीएलडी की कमला बहुगुणा से हार गए। 1984 में इंदिरा गांधी के निधन के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार रामपूजन पटेल को जीत मिली लेकिन इसके बाद नौ चुनावों में पार्टी मुख्य मुकाबले में भी नहीं रही। सिर्फ 2019 के चुनाव में पार्टी तीसरे स्थान पर रही लेकिन इसमें बसपा एवं सपा ने संयुक्त प्रत्याशी उतारा था। इसके अलावा अन्य चुनावों में पार्टी उम्मीदवार चौथे या पांचवें स्थान पर रहे।
जीत के लिए करना होगा संघर्ष, ग्रामीण मतदाताओं पर होगी नजर
कांग्रेस को फूलपुर में जीत दर्ज करने के लिए लंबा संघर्ष करना होगा। साथ ही उन्हें ग्रामीण मतदाताओं को रिझाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़नी होगी। इसके लिए कुछ दिनों पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रयागराज में भारत जोड़ो न्याय यात्रा भी की। साथ ही फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के मऊआइमा में रात्रि विश्राम कर वरिष्ठ नेताओं से चुनावी रणनीति पर चर्चा की। इस लाेकसभा चुनाव में कांग्रेस का सपा के साथ गठबंधन है। अब देने वाली बात यह है कि फूलपुर सीट पर कौन सी पार्टी दावेदारी करती है।
1991 के बाद नहीं बची जमानत
फूलपुर सीट पर पिछले नौ चुनावों में पार्टी उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में भी नहीं रहे। 1991 से 2019 के बीच कुल नौ लोकसभा चुनाव हुए। इनमें पार्टी प्रत्याशी को ढाई से छह फीसदी ही वोट मिले हैं। 2004 में तो मात्र 1.50 प्रतिशत वोट मिले।