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ऑफलाइन प्रमाणपत्र की आड़ में लाखों का खेल
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Sun, 01 Feb 2015 11:34 PM IST
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वैसे तो शासन ने आय, जाति, निवास, हैसियत प्रमाणपत्र आदि जारी करने की व्यवस्था ऑनलाइन कर दी है लेकिन वेंडरों ने इसके बजाय ऑफलाइन प्रमाणपत्र जारी कर जनता से लाखों रुपये वसूल लिए और उसे सरकारी खाते में जमा भी नहीं किया। अब वेंडरों से वसूली के लिए प्रशासन ने शासन को पत्र भेजकर अनुमति मांगी है। इसके साथ ही ऑनलाइन प्रमाणपत्र जारी किए जाने में तमाम खामियां सामने आने के बाद शासन ने संबंधित एजेंसी का नवीनीकरण रोक कर रीटेंडर करते हुए नए सिरे से आवेदन आमंत्रित कर लिए हैं।
जिला प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक ऑनलाइन व्यवस्था के तहत आवेदनकर्ताओं से प्रमाणपत्र के लिए जो फीस वसूली जाती है, उसका एक हिस्सा सरकारी खाते, दूसरा हिस्सा इस व्यवस्था को संभाल रही एजेंसी डीईएसजी और तीसरा हिस्सा वेंडर के खाते में जाता है। सबसे अधिक प्रमाणपत्र जून से अगस्त के बीच जारी किए जाते हैं और इस दौरान आवेदनों का ढेर लगा रहता है। वर्ष 2014 में इसी वजह से सर्वर डाउन हो गया और हजारों आवेदन अटक गए। ऐसे में प्रशासन की तरफ से एजेंसी को निर्देश दिए गए कि प्रमाणपत्र ऑफलाइन जारी कर दिए जाएं। ऑफलाइन प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान वेंडरों ने संबंधित एजेंसी की मशीनरी का कोई उपयोग नहीं किया। इसके बावजूद आवेदनकर्ताओं से पूरा शुल्क लिया गया। वेंडरों ने शुल्क में एजेंसी का हिस्सा भी अपने पास रख लिया जबकि उसे सरकारी खाते में जमा करा देना चाहिए था। बाद में मामले का खुलासा तो रकम की गणना की गई। पता चला कि वेंडरों ने तकरीबन 70 लाख रुपये का गबन किया है।
इस दौरान एक और गड़बड़ी भी सामने आई, जिसके लपेटे में सीधे एजेंसी आ गई। दरअसल, एजेंसी के पास ओबीसी और एससी का जाति प्रमाणपत्र बनाने के लिए अंग्रेजी में वह प्रारूप ही उपलब्ध नहीं था, जो केंद्रीय संस्थानों में मान्य है। ऐसे में केंद्रीय संस्थानों में नौकरी या केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसके साथ ही तहसील और एजेंसी के कुछ कर्मचारियों ने अभ्यर्थियों की इस मजबूरी का फायदा उठाया और मोटी रकम वसूलकर फर्जी प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए। ऐसी तमाम शिकायतें आने के बाद शासन ने एजेंसी का नवीनीकरण रोक दिया है। शासन की तरफ से दूसरी एजेंसी के चयन के लिए रीटेंडर किया गया है।
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जिला प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक ऑनलाइन व्यवस्था के तहत आवेदनकर्ताओं से प्रमाणपत्र के लिए जो फीस वसूली जाती है, उसका एक हिस्सा सरकारी खाते, दूसरा हिस्सा इस व्यवस्था को संभाल रही एजेंसी डीईएसजी और तीसरा हिस्सा वेंडर के खाते में जाता है। सबसे अधिक प्रमाणपत्र जून से अगस्त के बीच जारी किए जाते हैं और इस दौरान आवेदनों का ढेर लगा रहता है। वर्ष 2014 में इसी वजह से सर्वर डाउन हो गया और हजारों आवेदन अटक गए। ऐसे में प्रशासन की तरफ से एजेंसी को निर्देश दिए गए कि प्रमाणपत्र ऑफलाइन जारी कर दिए जाएं। ऑफलाइन प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान वेंडरों ने संबंधित एजेंसी की मशीनरी का कोई उपयोग नहीं किया। इसके बावजूद आवेदनकर्ताओं से पूरा शुल्क लिया गया। वेंडरों ने शुल्क में एजेंसी का हिस्सा भी अपने पास रख लिया जबकि उसे सरकारी खाते में जमा करा देना चाहिए था। बाद में मामले का खुलासा तो रकम की गणना की गई। पता चला कि वेंडरों ने तकरीबन 70 लाख रुपये का गबन किया है।
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इस दौरान एक और गड़बड़ी भी सामने आई, जिसके लपेटे में सीधे एजेंसी आ गई। दरअसल, एजेंसी के पास ओबीसी और एससी का जाति प्रमाणपत्र बनाने के लिए अंग्रेजी में वह प्रारूप ही उपलब्ध नहीं था, जो केंद्रीय संस्थानों में मान्य है। ऐसे में केंद्रीय संस्थानों में नौकरी या केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। इसके साथ ही तहसील और एजेंसी के कुछ कर्मचारियों ने अभ्यर्थियों की इस मजबूरी का फायदा उठाया और मोटी रकम वसूलकर फर्जी प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए। ऐसी तमाम शिकायतें आने के बाद शासन ने एजेंसी का नवीनीकरण रोक दिया है। शासन की तरफ से दूसरी एजेंसी के चयन के लिए रीटेंडर किया गया है।
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