{"_id":"57ed78214f1c1b81675754ab","slug":"no-longer-mourn-a-time-to-kill","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब मातम मनाने नहीं, मारने का वक्त","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब मातम मनाने नहीं, मारने का वक्त
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 30 Sep 2016 02:14 AM IST
विज्ञापन
allahabad
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नैनी (ब्यूरो)। पाकिस्तान ने सारी हदें पार कर दी हैं। अब उसे जवाब दे ही देना चाहिए। आखिर कब तक मातम मनाया जाएगा। जब बॉर्डर पर सैनिकों को मरना ही है तो उन्हें भी मारने की छूट मिलनी चाहिए। सिर्फ मातमपुर्सी और मदद से काम नहीं चलने वाला। हुक्मरानों की शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब पाकिस्तान को करारा सबक मिलेगा। यह कहना है कारगिल शहीद नायक लालमणि यादव की विधवा संतोष देवी का।
उड़ी में सेना कैंप पर आतंकी हमले में 18 सैनिक मारे गए। बार्डर पर माहौल तनावपूर्ण है। बदले में भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बुधवार रात सर्जिकल स्ट्राइक की। ऐसे में लोगों के बीच कारगिल युद्ध की यादें ताजा हो गईं। कारगिल युद्ध में अपने पति नायक लालमणि को खो चुकीं संतोष देवी गुरुवार को दिनभर टीवी के सामने बैठी रहीं। रह-रहकर उनकी आंख में आंसू आ जा रहे थे। मानो सारा मंजर उनकी आंखों के सामने आ गया हो। चार सितंबर 1999 का दिन था। जब संतोष के पति कारगिल में शहीद हुए।
जब भी बार्डर पर कोई सैनिक मारा जाता है तो उन्हें लालमणि की याद आ जाती है। उस समय बड़ी बेटी मंजू 12 साल की थी। अंजू 10, आलोक सात और छोटा बेटा विवेक चार साल का था। हालांकि मौजूदा हालात से संतोष देवी खुश नहीं हैं। कहती हैं, ‘हर बार जवानों की मौत पर एक सा बयान सुनकर कान पक गए हैं। कब तक शांति बनाने की कोशिश की जाएगी।’ बेटों को सेना में भेजेंगी, इस सवाल पर संतोष देवी का कहना है, ‘बिल्कुल नहीं, पहले नेता जाएं बॉर्डर पर तो अपने बेटों को भेजूंगी।’ बोलीं, इस बार लोग आरपार की लड़ाई चाहते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
उड़ी में सेना कैंप पर आतंकी हमले में 18 सैनिक मारे गए। बार्डर पर माहौल तनावपूर्ण है। बदले में भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बुधवार रात सर्जिकल स्ट्राइक की। ऐसे में लोगों के बीच कारगिल युद्ध की यादें ताजा हो गईं। कारगिल युद्ध में अपने पति नायक लालमणि को खो चुकीं संतोष देवी गुरुवार को दिनभर टीवी के सामने बैठी रहीं। रह-रहकर उनकी आंख में आंसू आ जा रहे थे। मानो सारा मंजर उनकी आंखों के सामने आ गया हो। चार सितंबर 1999 का दिन था। जब संतोष के पति कारगिल में शहीद हुए।
विज्ञापन
जब भी बार्डर पर कोई सैनिक मारा जाता है तो उन्हें लालमणि की याद आ जाती है। उस समय बड़ी बेटी मंजू 12 साल की थी। अंजू 10, आलोक सात और छोटा बेटा विवेक चार साल का था। हालांकि मौजूदा हालात से संतोष देवी खुश नहीं हैं। कहती हैं, ‘हर बार जवानों की मौत पर एक सा बयान सुनकर कान पक गए हैं। कब तक शांति बनाने की कोशिश की जाएगी।’ बेटों को सेना में भेजेंगी, इस सवाल पर संतोष देवी का कहना है, ‘बिल्कुल नहीं, पहले नेता जाएं बॉर्डर पर तो अपने बेटों को भेजूंगी।’ बोलीं, इस बार लोग आरपार की लड़ाई चाहते हैं।
विज्ञापन