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वार्मर में बच्चे की जलकर मौत के मामले में नहीं हुई अब तक कोई कार्रवाई, दोषियों को बचाने में जुटा महकमा

Thu, 19 Aug 2021 07:48 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 19 Aug 2021 07:48 PM IST
सार

  • दोषी डॉक्टरों, कर्मचारियों को बचाने की कवायद में जुटा महकमा
  • डीएम के आदेश के बावजूद 36 घंटे बाद भी नहीं पूरी की जा सकी जांच

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No action has been taken so far in the case of child's burning in the warmer
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में वार्मर पर नवजात की मौत के मामले में स्वास्थ्य महकमा लीपापोती कर रहा है। विभाग के जिम्मेदार दोषी डॉक्टर और कर्मचारियों को बचाने की कवायद में जुटे हैं। तभी तो  घंटे बाद भी नवजात की मौत की जांच रिपोर्ट नहीं प्रस्तुत की जा सकी। जबकि, डीएम ने 24 घंटे के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश सीएमएस को दिया था।

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फतेहपुर जिले के खखरेरू निवासी जुनैद की पत्नी महेलिका ने 14 अगस्त को जिला अस्पताल में बेटे को जन्म दिया था। रात 9.14 बजे राउंड में गए चिकित्सक की सलाह पर नवजात को एसएनसीयू वार्ड में भर्ती करा दिया गया था। जुनैद के बड़े भाई जावेद का कहना है कि 15 अगस्त  की सुबह छह बजे बच्चे की नानी डायपर बदलने गई तो सभी ठीक था।

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No action has been taken so far in the case of child's burning in the warmer
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

उन्होंने स्टाफ से बच्चेें को देखने के लिए कहा लेकिन कोई कुर्सी से हिला तक नहीं। सभी स्टॉफ मोबाइल चलाने में ही मस्त थे। इसके करीब एक घंटे बाद परिवार के अन्य लोग वार्ड पहुंचे तो बच्चे के शरीर से धुआं निकल रहा था। उसकी सांसे थम चुकी थी। नवजात की चमड़ी इस तरह से जल गई थी कि पकड़ने में वह नोच आती थी। परिजनों ने स्वास्थ्य कर्मियों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए अस्पताल में हंगामा किया। साथ ही सीएमओ से लिखित शिकायत की। लेकिन, किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

मामला मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद मंगलवार को डीएम सुजीत कुमार ने सीएमएस से 24 घंटे के भीतर विस्तृत जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। सीएमओ डॉ केसी राय ने भी दो सदस्यीय टीम बनाकर प्रकरण की जांच कराने के लिए कहा था। डीएम के आदेेश के बावजूद 36 घंटे बाद भी जांच नहीं पूरी की जा सकी। सूत्रों की मानें तो अस्पताल प्रशासन लापरवाह डॉक्टरों, कर्मचारियों को बचाने की कवायद में जुटा हुआ। पूरे प्रकरण में लीपापोती करने का प्रयास किया जा रहा है। 

इनका कहना है
बुधवार को भी संयुक्त जिला अस्पताल का निरीक्षण किया गया। इस दौरान प्रकरण की जल्द जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। जांच रिपोर्ट आने पर दोषी डॉक्टरों, कम्रचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। -डॉ.केसी राय-सीएमओ

भगवान भरोसे रहती है जिला अस्पताल में नवजात शिशुओं की सुरक्षा

जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड के वार्मर में जलने से नवजात शिशु की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता खुलकर सामने आ गई है। हैरानी की बात तो यह है कि अस्पताल के वार्ड में पिछले 20 दिन से स्थाई तौर पर एक भी बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। सुबह दस बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक ओपीडी में रहने वाले मात्र तीन बाल रोग विशेषज्ञ ही वार्ड का भ्रमण कर भर्ती नवजात बच्चों के इलाज का कोरम पूरा करते हैं।

जिला अस्पताल में 14 अगस्त को फतेहपुर जिले के खखरेरू निवासी जुनैद की पत्नी महेलिका ने बच्चे को जन्म दिया था। जन्म के बाद शाम जब चिकित्सक राउंड पर आए तो उन्होंने बच्चे को वार्मर पर रखने की सलाह दी। 15 अगस्त की सुबह एसएनसीयू वार्ड में भर्ती महेलिका के नवजात शिशु की वार्मर में जल जाने से मौत हो गई। घटना को लेकर अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। पता चला कि जिस वक्त घटना हुई वार्ड में कोई भी चिकित्सक नहीं था। जो पैरामेडिकल स्टॉफ था वह मोबाइल पर गेम खेलने में मशगूल रहा।

घटना को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी सुजीत कुमार ने पूरे मामले की जांच के निर्देश दिए। इस बाबत अमर उजाला ने पड़ताल की तो चौकाने वाली हकीकत सामने आई। बताया गया कि एसएनसीयू वार्ड में स्थाई तौर पर किसी बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती ही नहीं है। यहां संविदा पर कार्यरत डॉ. निखिल धवन थे। वह सप्ताह में तीन दिन वार्ड आते थे। 31 जुलाई  को उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। इससे पहले यहां स्थाई तौर पर नियुक्त चिकित्सक डॉ. राजेंद्र मणि का कार्यकाल दिसंबर 2020 में ही समाप्त हो चुका है।

स्वास्थ्य विभाग की तरफ से उनकी संविदा नहीं बढ़ाई गई। यहीं रहे डॉ. धीरेंद्र कुमार का भी कार्यकाल 31 मार्च को पूरा हो चुका है। उनकी भी संविदा का रीन्यूवल नहीं हो सका। अब अस्पताल में भर्ती बच्चों के इलाज के जिम्मा जिला अस्पताल की ओपीडी में बैठने वाले चिकित्सक डॉ. विश्वप्रकाश, डॉ. आरके निर्मल और डॉ. केके मिश्रा पर है। यह चिकित्सक सुबह दस बजे से दो बजे के बीच ही अस्पताल में रहते हैं। दोपहर दो बजे के बाद जिला अस्पताल में एक भी बाल रोग विशेषज्ञ नहीं रहता। नतीजतन एसएनसीयू वार्ड में भर्ती शिशुओं की जिम्मेदारी भगवान भरोसे ही रहती है।

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No action has been taken so far in the case of child's burning in the warmer
born baby - फोटो : Instagram
स्टॉफ देता है ट्रेनिंग
एसएनसीयू वार्ड में नियुक्त कर्मचारियों की मनमानी का आलम यह है कि वह खुद ही भर्ती बच्चे के तीमारदार को मशीन के ऑफ और ऑन करने की ट्रेनिंग देते हैं। भर्ती शिशु के परिवार के एक सदस्य को बता दिया जाता है कि कितने घंटे में मशीन का प्लग ऑन करना है और कब ऑफ। महेलिका के नवजात शिशु के मामले में भी वही हुआ था। 15 अगस्त की सुबह महेलिका की मां शिशु का डायपर बदलने गई थी। स्टॉफ के लोगों की मानें तो उसने देखा की मशीन ऑफ है, इस वजह से वह प्लग ऑन करके चली आई। स्टॉफ ने भी ध्यान नहीं दिया और मासूम ने वार्मर में ही तड़प कर दम तोड़ दिया।

इमरजेंसी के चिकित्सक ही करते हैं इलाज
एसएनसीयू वार्ड में भर्ती किसी बच्चे की अगर दोपहर दो बजे के बाद तबीयत खराब होती है तो इमरजेंसी मेडिकल अफसर या फिर सीएमएस ही इलाज करते हैं। अगर बच्चे की हालत में सुधार नहीं हुआ तो उसे प्रयागराज के लिए रेफर कर दिया जाता है।

पड़ोसी जिलों से भी खूब आते हैं मरीज
जिला अस्पताल में कौशांबी के अलावा पड़ोसी जनपद फतेहपुर और चित्रकूट व प्रतापगढ़ से भी मरीज आते हैं। दरअसल जिला मुख्यालय मंझनपुर पड़ोसी जनपद की सीमा वाले गांवों से सटा है। इस वजह से मरीजों की संख्या ज्यादा रहती है। हालात यह हो जाते हैं कि एसएनसीयू वार्ड की एक मशीन पर कभी-कभी दो-दो बच्चों को भर्ती करके इलाज करना पड़ता है।

इनका कहना है 
अस्पताल में बाल रोग चिकित्सकों की कमी है। खासतौर पर एसएनसीयू में ज्यादा दिक्कत है। चिकित्सकों की तैनाती या पुराने चिकित्सकों की संविदा बहाली के लिए सीएमओ को पत्र लिखा गया है। रहा सवाल वार्ड में भर्ती नवजात शिशु की मौत का तो जांच कराई जा रही है।डॉ. दीपक सेठ, सीएमएस
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