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इलाहाबाद विवि में डिग्री के नए प्रारूप को मंजूरी
इलाहाबाद/ब्यूरो
Updated Wed, 30 Jan 2013 01:55 PM IST
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय से छात्र-छात्राओं को अब डिग्री प्रारूप के कारण अवसरों से वंचित नहीं होना पड़ेगा और न ही परेशानी उठानी पड़ेगी। अब आगे जो भी डिग्री मिलेगी उसमें फैकेल्टी के साथ विभाग और रिसर्च टॉपिक भी दर्ज होगा। एकेडमिक काउंसिल की बैठक में मंगलवार को डिग्री के नए प्रारूप को मंजूरी मिल गई।
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प्रारूप में बदलाव के लिए गठित कमेटी ने डिग्री में एकेडमिक काउंसिल, कार्यपरिषद आदि का विवरण दर्ज करने का भी प्रस्ताव रखा था लेकिन सदस्यों ने इसे जरूरी नहीं समझा। छात्र-छात्राओं के हित को देखते हुए मात्र सब्जेक्ट, टॉपिक दर्ज करने का फैसला लिया गया। डिग्री की साइज छोटी तथा कंप्यूटरीकृत करने समेत अन्य बदलावों को भी एकेडमिक काउंसिल ने मंजूरी दे दी।
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एक अन्य फैसले के तहत इस साल दीक्षांत समारोह आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया। इसके लिए चांसलर मेडल समेत अन्य पदकों के नाम में बदलाव के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी गई। बैठक में गोविंद बल्लभ पंत संस्थान सामाजिक विज्ञान संस्थान में ‘डेवलपमेंट’ में डीफिल तथा ‘डेवलपमेंट एंड सोशल इश्यूज’ में परास्नातक कोर्स शुरू करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिल गई।
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इसमें शारीरिक शिक्षा विभाग में पीएचडी कोर्स शुरू करने पर भी चर्चा हुई लेकिन विभाग में परास्नातक की पढ़ाई नहीं होने के कारण रजिस्ट्रार ने इस पर आपत्ति उठाई। विवाद बढ़ने पर सदस्यों ने निर्णय लिया कि यदि ऑर्डिनेंस में प्रावधान है तो विभाग में डीफिल कोर्स शुरू किया जा सकता है। कॉलेज शिक्षकों को रिसर्च कराने की अनुमति देने पर भी चर्चा हुई लेकिन अधिकतर सदस्य इसके विरोध में रहे। हालांकि कुलपति के सुझाव पर इसके लिए कमेटी बनाने पर सहमति बनी।
राजकीय यूनानी कॉलेज की संबद्धता संबंधी प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया। बैठक में ग्रीवांस सेल के गठन, एआर-डीआर की कार्य संस्कृति में बदलाव समेत कई अन्य प्रस्तावों को भी मंजूरी मिली। बैठक में प्रवेश परीक्षाओं की केंद्रीयकृत व्यवस्था का प्रजेंटेशन भी किया गया।
डीफिल ऑर्डिनेंस का प्रस्ताव सदस्यों ने नकारा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एकेडमिक काउंसिल ने नए डीफिल ऑर्डिनेंस के प्रस्ताव को नकार दिया है। यह प्रस्ताव स्वयं कुलपति की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने तैयार किया है। इसलिए इसे पास कराने को लेकर कुलपति की खास रुचि थी लेकिन नियमानुसार कमेटी गठित नहीं होने की बात करके सदस्यों ने इस पर चर्चा ही नहीं होने दी।
डीफिल के नए फार्मेट में रिसर्च पेपर विदेशी संस्थानों को भी भेजने समेत कई ऐसे प्रावधान हैं जो शिक्षकों को स्वीकार नहीं है। रिसर्च में सुधार के लिए तैयार इस प्रस्ताव में कुलपति को काफी अधिकार दिए गए हैं। इसके अनुसार शोधार्थी का 10 सदस्य इंटरव्यू लेंगे। इनमें तीन विदेशी होंगे। इनके चयन का अधिकार भी कुलपति को होगा। कई अन्य प्रावधान भी हैं जिससे शिक्षकों पर कई स्तर पर अंकुश लगने तथा डीफिल की प्रक्रिया जटिल होने की बात कही जा रही है।