महाकुंभ 2025: कल्पवासियों की कुटिया में आ बसी महंगाई, आस्था फिर भी उफान पर
महाकुंभ में इस बार महंगाई भी अपना प्रभाव दिखा रही है लेकिन यह प्रभाव इतना नहीं है कि आस्था पर भारी पड़ जाए। कल्पवासियों का कहना है कि कुछ भी हो वो इसका हिस्सा बनके रहेंगे।
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महाकुंभ में कल्पवासियों से पहले महंगाई आ बसी है। इनकी जिस सामान्य कुटिया और रहन-सहन सुविधाओं के पांच हजार रुपये चुकाने पड़ते थे, इसके रेट सात हजार पहुंच चुके हैं। गोल वाला टेंट पहले सात-आठ हजार में मिल जाता था, अब 15 हजार का है। मगर, इस महंगाई के बहाने कोई शिगूफा पालने जा रहे हैं तो ठहरिए। कल्पवासियों की आस्था अब भी उफान पर है। वह कहते हैं, महंगाई चाहे जेतना बढ़ जाए, कल्पवास तौ करिबै करब। ई महाकुंभ है...बार-बार थोड़े न देख पाउब।
कल्पवासियों के टेंट की व्यवस्था मेला प्रशासन नहीं करता। टेंट कुछ संस्थाएं बनाती हैं, जिन्हें मेला प्रशासन मामूली दर पर जमीन उपलब्ध कराता है। यहीं पर संस्थाएं अपने यजमानों के कैंप लगवाती हैं। नए यजमान को और ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। बावजूद इसके धर्मभीरू लोग इस ओर हर साल बढ़ते जाते हैं। प्रयागराज के कौड़िहार निवासी गोविंद प्रसाद बीते तीन साल से कल्पवास कर रहे हैं। हर साल लगभग 20 हजार रुपये में धार्मिक प्रयोजन निपट जाता था। इस बार 30 हजार से कम में न हो पाएगा। कारण? टेंट से लेकर जरूरत की सारी सुविधाओं के दाम 30 फीसद से ज्यादा बढ़ा दिए गए हैं। मगर, उनका उत्साह कम नहीं पड़ा। 10 जनवरी से वह यहां कल्पवास के लिए आने की तैयारी कर चुके हैं।
प्रतापगढ़ के हीरागंज बसनी का पूरा निवासी कुसुमलता भी दो साल से संगम में कल्पवास कर रही हैं। वह बताती हैं कि इस बार महाकुंभ है न, इसलिए सब चीजें महंगी मिल रही हैं। वह भी अपना बजट बढ़ा चुकी हैं। नवाबगंज निवासी राकेश मिश्रा भी महंगाई के बावजूद उत्साहित हैं। कहते हैं, महाकुंभ में कल्पवास एक अलग अनुभव है। यह बार-बार थोड़े देखैं का मिली।
तीर्थ पुरोहितों को सरकार से सुविधाएं नहीं मिलतीं। कल्पवासी तीर्थ पुरोहितों के ही शिविरों में प्रवास करते हैं। हमें जो टेंट ढाई हजार में मिलते थे, वह चार हजार रुपये के मिल रहे हैं। इसी कारण शिविर महंगे हो गए हैं। शिवजी शर्मा, अध्यक्ष-प्रयागवाल सभा
40 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई है। इसी कारण शिविरों की कीमत बढ़ गई है। संतों के सेक्टरों को छोड़कर अन्य जगहों पर कल्पवासियों के लिए सिर्फ तीर्थपुरोहित ही शिविर उपलब्ध करा रहे हैं। श्रवण कुमार पांडेय, तीर्थपुरोहित, रघुवीर यात्री शिविर
क्या है कल्पवास
संगम की रेती पर माघ के पूरे महीने निवास कर पुण्य फल प्राप्त करने की साधना को ही कल्पवास कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि हो सकती है। तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर भी कल्पवास किया जा सकता है। मान्यता है कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश होने के साथ एक मास के कल्पवास से इच्छित फल की प्राप्ति होती है। जन्म जन्मांतर के बंधनों से भी मुक्ति मिलती है। पुराणों के अनुसार, एक कल्पवास का फल उतना ही है, जितना सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का। महाकुंभ में लाखों साधु-संतों के साथ आम लोग भी कल्पवास करते हैं। कल्पवास पौष पूर्णिमा स्नान के साथ 13 जनवरी से शुरू होकर एक माह बाद माघी पूर्णिमा तक चलेगा।
एक बार भोजन, तीन बार स्नान
कल्पवास में श्रद्धालु एक बार भोजन करते हैं और तीन बार स्नान। सुबह गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना से दिनचर्या शुरू होती है। शास्त्रों के अनुसार, कल्पवासी को दिन में तीन बार (भोर में, दोपहर और शाम ) गंगा स्नान करना चाहिए। एक बार भोजन और एक बार फलाहार लेना चाहिए। खाने-पीने में अरहर की दाल, लहसुन और प्याज जैसी चीजें वर्जित हैं।