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लोकसभा चुनाव : हर दल ने बाहुबलियों को कराई सत्ता की सवारी, संसद में पहुंचने में सफल रहे कई माफिया

Wed, 20 Mar 2024 07:33 PM IST
विनोद सिंह अनूप ओझा, प्रयागराज
अनूप ओझा, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 20 Mar 2024 07:33 PM IST
सार

शुचिता की दुहाई करने वाले राजनीतिक दलों का मुखौटा भी उतर जाता है। अपवाद में भी कोई ऐसा प्रमुख दल नजर नहीं आता, जिसने इन बाहुबलियों को शह और संरक्षण न दिया हो। प्रयागराज में बाहुबलियों के सियासी सफर का जायजा ले रहे हैं।

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Lok Sabha elections: Every party made strongmen ride to power, many mafias were successful in reaching Parliam
अतीक अहमद। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

राजनीति की गंगा में वक्त के साथ बहुत पानी बह चुका। अस्सी के दशक की यही राजनीति थी, जब संगमनगरी में भी माफिया के साथ उसका इतना मजबूत गठजोड़ हो गया था कि दोनों एक दूसरे के पूरक हो गए थे। दौर बदलने के साथ बहुत कुछ बदल चुका है। देश-देशांतर तक जिस माफिया अतीक अहमद की गूंज हुआ करती थी, अब वह भी अतीत हो चुका है। फिर भी, सियासत से जुड़े अतीत के पन्ने उलटते हैं तो अतीक ही नहीं, कई और बाहुबलियों का उदय-अस्त सब दिखाई देने लगता है।

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शुचिता की दुहाई करने वाले राजनीतिक दलों का मुखौटा भी उतर जाता है। अपवाद में भी कोई ऐसा प्रमुख दल नजर नहीं आता, जिसने इन बाहुबलियों को शह और संरक्षण न दिया हो। प्रयागराज में बाहुबलियों के सियासी सफर का जायजा ले रहे हैं।
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प्रयागराज। बात सबसे पहले अतीक अहमद की। पढ़ाई में फिसड्डी अतीक ने गुंडई को काली कमाई का जरिया बनाया। यातनाओं के किस्से कत्ल-ओ-आम तक पहुंच गए। मसीहा बनने के लिए दबंगई से कमाई रकम गरीबों में लुटाई जाने लगी। ...और वह बन भी गया। फिर काले कारनामों पर सफेद लिबास चढ़ाने का ख्याल आया और अतीक ने राजनीति की ओर कदम बढ़ाए 1989 में। शहर पश्चिमी सीट से निर्दलीय विधायक बने अतीक का हौसला बुंलद हो गया। दौलत और दबंगई के बूते उसने ऐसी छाप छोड़ी कि 1991 और 1993 में भी उसका सिक्का खूब चला। तीन बार निर्दलीय विधायक चुने जाने से अतीक का चौतरफा दबदबा कायम हो गया।

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गेस्ट हाउस कांड में आरोपी अतीक पर सपा के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव ने हाथ रख दिया और वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी से उतार दिया। शहर पश्चिमी सीट से वह चौथी बार जीता। लेकिन, 2002 के विधानसभा चुनाव से पहले अतीक से मुलायम ने दूरी बना ली और उस दौर के उभरते नेता डॉ. सोनेलाल पटेल के अपना दल से गलबहियां कर लीं। उसे प्रदेश अध्यक्ष तक बनाया गया। वह परंपरागत सीट से पांचवीं बार विधायक भी चुना गया।

इस बीच, भाजपा-बसपा सरकार बिखर गई तो मुलायम ने सत्ता के लिए जोड़तोड़ शुरू की। अतीक समेत अपना दल के तीनों विधायक भी सपा के हो गए। सत्ता फिर मुलायम के हाथों आ गई। अतीक को 2004 के चुनाव में सपा ने फूलपुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ाया और उसने सारे दिग्गजों को परास्त करके जीत हासिल कर ली। संगमनगरी में बाहुबली के रूप में अतीक ही पहला चेहरा था, जो देश की सबसे बड़ी पंचायत तक पहुंचा।

हालांकि, इसी के साथ उसके पराभव के दिन भी शुरू हो गए। 2007 में मायावती सरकार बनते ही गेस्ट हाउस कांड फिर जिंदा हो गया और अतीक के खिलाफ छापेमारी शुरू हो गई। चौतरफा छीछालेदर होने से अतीक से सपा ने भी किनारा कर लिया। अतीक को जेल जाना पड़ा।

अतीक अहमद ने फूलपुर से दर्ज की थी जीत


जमानत पर रिहाई हुई तो फिर अपना दल ने उसे फूलपुर लोकसभा से टिकट दे दिया। इस बार उसका दांव नहीं चला। 2012 के चुनाव में उसने जेल से ही विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सका। सपा सरकार के आते ही उसकी जेल से रिहाई हो गई और 2014 के लोकसभा चुनाव में सुल्तानपुर से टिकट पा लिया। बाद में, लड़ाया गया श्रावस्ती से। यहां भी उसे हार मिली। अतीक का भौकाल लगातार घटने लगा था। वह विधायक बनने के लिए छटपटाने लगा। 2017 के विधानसभा चुनाव में उसने कानपुर के कैंट से टिकट हासिल करने की जुगत भिड़ाई। शिवपाल यादव ने उसे टिकट दे भी दिया, लेकिन उसकी गुंडागर्दी के किस्से इतने भारी पड़ गए कि अखिलेश यादव ने टिकट काट दिया।

भाजपा की प्रदेश में सरकार बनते ही अतीक के दुर्दिन फिर आ गए। अतीक की गिरफ्तारी हुई तो 2018 से उसने फूलपुर सीट से निर्दलीय ही पर्चा दाखिल कर दिया। अतीक को 48,094 वोट हासिल हुए। कहा गया कि भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई सीट को कब्जाने के लिए ही पर्दे के पीछे से अतीक को चुनाव लड़ाया था। हालांकि, दांव चला नहीं और सपा के नागेंद्र सिंह पटेल 59,460 मतों से यह उपचुनाव जीत गए।

इसी के साथ अतीक का चुनावी अध्याय भी खत्म हो गया। अतीक की पत्नी शाइस्ता बेगम ने जरूर पहले असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम की सदस्यता ली। 2022 में उन्हें प्रत्याशी भी बनाया गया, हालांकि, वह चुनाव नहीं लड़ीं। कुछ वक्त बाद शाइस्ता को बसपा ने शरण दी और मेयर का प्रत्याशी बनाने का संकेत दिया। उस वक्त तक शाइस्ता पर कोई मुकदमा नहीं था, लेकिन जैसे ही उमेश पाल की हत्या की साजिश में इनामी आरोपी बनी, बसपा ने उसे निष्कासित कर दिया।

प्रयागराज की धरती पर दूसरे माफिया का उदय हुआ, कपिलमुनि करवरिया के रूप में। बात 1996 की है। झूंसी से सपा विधायक जवाहर पंडित (विधायक विजमा यादव के पति) को कॉफी हाउस के पास सरेबाजार एके 47 से भून डाला गया था। हत्याकांड के 23 साल बाद बाहुबली कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया समेत कई लोगों को उम्रकैद की सजा हो चुकी है।


खात्मे की ओर बाहुबल का दौर


राजनीति में अपराधीकरण के सवाल पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एमपी दुबे बताते हैं कि एक समय सारे राजनीतिक दल बाहुबलियों को संरक्षण देने लगे थे। चूंकि माफिया के पास चुनाव में लुटाने के लिए भरपूर पास पैसा था। मदद के बहाने गरीबों के मसीहा की छवि बना चुके थे। खास वोट बैंक भी था इनका। पर, वर्तमान में राजनीति बदल चुकी है। चुनाव आयोग ने दागियों पर कड़े कानून बनाए ही हैं, लोग भी जागरूक हुए हैं। सरकार भी सख्ती बरत रही है। इसी से बाहुबलियों का बोलबाला समाप्ति की ओर है।

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