फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Limited to a mere ritual Labour Day

महज रस्म अदायगी तक सिमटा मजदूर दिवस

Mon, 02 May 2016 01:49 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Mon, 02 May 2016 01:49 AM IST
विज्ञापन
Limited to a mere ritual Labour Day
मजदूर द‌िवस - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
दुनिया भर के मजदूरों ने 130 बरस पहले अपने हक की जो लड़ाई शुरू की थी, वह आज भी कमोबेश जारी है। एक तरफ पूंजीपतियों की संपत्तियां दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर समाज का वह मेहनतकश वर्ग है, जो दिन-रात मेहनत करने के बावजूद अपने लिए दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पा रहे है। शोरशराबे के बीच मेहनतकशों के मुद्दे हाशिये पर हैं। सवाल यह भी कि क्या मेहनतकशों के मुद्दे उठाने का जिम्मा सिर्फ वामपंथी पार्टियों के पास है। मजदूर दिवस तो समाज के मेहनतकश लोगों के लिए है, ऐसे में मेहनतकश राजनीतिक दलों के एजेंडे से बाहर क्यों है। मई दिवस सिर्फ रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गया है। ‘अमर उजाला’ ने वजह तलाशने की कोशिश की तो कर्मचारी संगठनों और 
विज्ञापन


सीटू नेता हरिश्चंद्र द्विवेदी कहते हैं, सरकारें कॉरपोरेट के हितों को साध रहीं है। और तो और उन्हीं के इशारों पर काम करते हुए श्रम सुधारों के नाम पर अधिकारों में कटौती  की जा रही है। कर्मचारी या मजदूर 12 से 14 घंटे काम कर रहे हैं जिसके बदले उन्हें अपेक्षित मानदेय नहीं मिल रहा है। वहीं पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता जा रहा है। सरकारों ने भी उन्हें कई तरह से छूट दे रखी है।
विज्ञापन


वरिष्ठ साहित्यकार नीलकांत कहते हैं, दुनिया भर में धनाढ्य वर्ग एक फीसदी है जिसने अपने हितों को साधने के लिए इतने हथियार अपना रखे हैं कि लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं। उन्होंने मेहनतकशों को तमाम तरह के मनोरंजन के साधनों में उलझा रखा है। सरकारें भी उनका ही हित साध रही हैं। मजदूरों के अधिकारों को काट कर तमाम तरीके की रियायतें दे रही हैं, जिसके कारण यह खाईं बढ़ रही है। विधायक अनुग्रह नारायण सिंह कहते हैं, मेहनतकशों को जाति एवं धर्म के नाम पर इतना बांट दिया गया है कि उनमें आपसी एकता का अभाव है, जिसके चलते मजदूर दिवस का दायरा कम होता जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


केंद्रीय कर्मचारी नेता टीपी मिश्र भी मानते हैं कि मजदूर दिवस का दायरा पहले से कम हो गया है। मई दिवस तो सभी के लिए है। अकेले वामपंथी पार्टियों से ही इसे जोड़ना ठीक नहीं। मई दिवस पर सुभाष चौराहे पर कांग्रेस, भाजपा सहित विभिन्न राजनीति पार्टियों और मजदूर संगठनों के लोग जुटते जरूर हैं लेकिन अब कर्मचारियों के आपसी टकराव से इसका असर कम हुआ है। इसी वजह से मजदूर दिवस सिर्फ परंपरा बन कर रह गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed