न कोई ओर न छोर। सहसा सबकुछ ठहर सा गया। चहुंदिश सिर्फ सिर ही सिर। विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक समागम में कुंभ के दूसरे स्नान पर्व मौनी अमावस्या पर ऐसा ही दृश्य था। पावन त्रिवेणी तट पर आस्था का ऐसा जनसमुद्र पहले नहीं देखा गया था।
भक्ति भाव की लहरों में सारे तटबंध टूट गए। जल, थल, नभ से कड़ी निगरानी के बीच मौनी अमावस्या की दिन रात डुबकी लगती रही। कुंभ मेला प्रशासन के अनुसार शाम तक देश-दुनिया के हर कोने के पहुंचे पांच करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम समेत 41 घाटों पर पुण्य की डुबकी लगाई।
भीड़ की वापसी होने के साथ ही रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों के बाहर लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं के पहुंचने से तीर्थराज प्रयाग के मुख्य मार्गों पर यातायात ठहर सा गया है।
पंटून पुलों पर आधी रात के बाद से संगम समेत अरैल से फाफामऊ के बीच बने घाटों पर उमड़ी ठसाठस भीड़ के बीच मौनी अमावस्या का स्नान शुरू हुआ। पंटून पुलों पर लंबी कतारें फाफामऊ से अरैल के बीच आठ किमी लंबे संगम तट के घाटों पर तिल-तिल कर बढ़ती-उतरती रहीं। अखाड़ों के शाही स्नान के समय भोर में पांटून पुल नंबर-एक अक्षयवट और काली मार्ग के पुल पर यातायात रोके और छोड़े जाने से स्थिति असहज होने लगी, लेकिन ईश्वर की कृपा से सब कुछ ठीक रहा।
मंगलकामनाओं, मनौतियों और दान-पुण्य की परंपराओं के संगम में बेसुध होकर लोग हर हर महादेव के जयकारे लगाते हुए चल रहे थे। कहीं भजनों की गूंज उठ रही थी, तो कहीं संतों की टोलियां ढोल, डफली पर रामनाम का संकीर्तन कर आस्था के रंग को और गाढ़ा बना रही थीं। लोग एक दूसरे से संगम की दूरी पूछते बढ़ रहे थे। उसी भीड़ में पुरोहित तिलक-त्रिपुंड भी लगाते रहे और दानपुण्य का भी सिलसिला चलता रहा।
सुबह छह बजे भीड़ का दबाव बढ़ा तो बड़े हनुमान मंदिर में दर्शन रोक दिया गया। हर तरफ धक्कामुक्की और ठेलमठेल होता रहा और लोग संगम में पुण्य की डुबकी लगाते रहे। पौ फटने से पहले ही सभी रास्ते पैक हो गए थे। दो पहिया, चार पहिया वाहनों का प्रवेश ठप किए जाने से आठ से 10 किमी तक पैदल चलकर लोगों को संगम पहुंचना पड़ा। फाफामऊ, बख्शीबांध, नागवासुकि, नैनी ब्रिज, अरैल, सोमेश्वर महादेव समेत अन्य जगहों पर आस्था का ज्वार एक समान उमड़ था।
अखाड़ों के शाही शाही स्नान में नागाओं की फौज बनी आकर्षण का केंद्र
प्रयागराज। मौनी अमावस्या के स्नान पर्व पर भस्मी-भभूत पोतकर तरह-तरह के वेश में शाही स्नान के लिए निकले नागाओं की झलक पाने की होड़ मच गई। लाखों की तादाद में लोग बैरीकेडिंग और जाली के पार खड़े होकर नागाओं के शाही स्नान की झलक पाने के लिए बेताब थे। हाथों में तलवार, डमरू, त्रिशूल और सिर पर रुद्राक्ष के मुकुट लगाकर नागा निकले तो संगम का नजारा बदल गया।