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कुंभ 2019: सांईं मां से मिलकर कई विदेशियों को भाया सनातन धर्म, इंजीनियरिंग छोड़ रमाई धूनी

Sun, 10 Feb 2019 07:19 PM IST
shubham त्रिलोकी यादव, अमर उजाला, प्रयागराज
त्रिलोकी यादव, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: shubham Updated Sun, 10 Feb 2019 07:19 PM IST
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After contact of sai maa many foreigners left their jobs and become saint in kumbh mela

फ्रांस के जयेंद्र दास महाराज सनातन धर्म से प्रभावित होने से पहले फ्रांस में इंजीनियर थे। उन्होंने वैद्युतीय धातु विज्ञान में परास्नातक के बाद बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की लेकिन करीब 20 साल पहले सांईं मां से मिले और धीरे धीरे उनकी जिंदगी बदल गई। अपना धर्म छोड़ा, देश छोड़ा और बन गए सनातम धर्म के प्रहरी। जयेंद्र दास उन नौ विदेशियों मेंं शामिल हैं जिन्हें शुक्रवार को निर्मोही अनिअखाड़े में महामंडलेश्वर बनाया गया। सनातन धर्म के प्रचार प्रसार के जीवन समर्पित कर देने वाले जयेंद्र दास यूरोप तथा दुनिया के कई देशों में वैदिक शिक्षा से व्यक्तित्व परिवर्तन की कार्यशाला शुरू की है।

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After contact of sai maa many foreigners left their jobs and become saint in kumbh mela
sai maa

फ्रांस के रहने वाले महामंडलेश्वर जयेंद्र दास महाराज इंजीनियरिंग करने के बाद वैद्युतिकीय रसायन विज्ञान और वैद्युतिकीय रसायन विज्ञान व वैद्युतीय धातु विज्ञान में परास्नानतक के बाद नौकरी शुरू कर दी। इसी दौरान पता नहीं क्या हुआ, वे डिप्रेशन के शिकार हो गए। धीरे-धीरे दुनिया उन्हें बेगानी लगने लगी। इसी अवस्था में किसी ने उनकी मुलाकात साईं मां से कराई। साईं मां के व्यक्तित्व में जादू था।

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जयेंद्र धीरे-धीरे साईं मां ही नहीं संपूर्ण दर्शन और धर्म से प्रभावित होते गए। जल्द ही उन्होंने निर्णय ले लिया कि पूरा जीवन अब सनातन धर्म की सेवा में लगाएंगे। वे साईं मां के सानिध्य में विश्व के 50 से अधिक देशों में प्रबंधक शिक्षा, वक्ता, प्रशिक्षक  एक परीक्षक के रूप में वैदिक शिक्षा पर आधारित व्यक्तित्व परिवर्तन की कार्यशाएं चलाते हैं। ताई ची शिक्षा और ऊर्जा अभिकेंद्रों के वे विशेषज्ञ बन गए हैं। सनातन धर्म के प्रति उनके लगाव और कामों को देखते हुए साईं मां और निर्मोही अनि अखाड़े ने उन्हें महामंडलेश्वर बनाने का निर्णय लिया।

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मणिकर्णिका घाट पर दीक्षित हुए इज्रायल के दयानंद 
इज्रायल के दयानंद शुक्रवार को निर्मोही अखाड़े के महामंडलेश्वर बने तो एक बार उन्हें वह सब कुछ याद आ गया जब उन्होंने सनातन धर्म के लिए देश धर्म सब छोड़ दिया था। साल 2003 में वह भारत आए। साईं मां की संगत में ब्रम्हचारी जीवन की शुरूआत की। 2008 में हिंदू धर्म के आचार्य बन गए। वर्तमान में आचार्य दयानंद कोलोरोडा में साईं मां के आश्रम में रहते हुए भंडारी और मुख्य पुजारी के रूप में सेवा करते हैं। वे वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर तीन साल रहकर सतुआ बाबा के सानिध्य में दीक्षित हुए। उन्होंने सनातन धर्म की अलख जगाने के लिए 20 देशों भ्रमण किया। इज्रायल की राजधानी में शिविती आश्रम की स्थापना की।

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lalita maa

कीर्तन कर अलख जगाती हैं अमेरिका की ललिता मां
अमेरिका की ललिता मां कीर्तन कर अलख जगाती हैं। 2004 में साईं मां के संपर्क में आने के बाद 2016 में उन्होंने ब्रम्हचर्य की दीक्षा ली। योरोप के कई देशों में ललिता मां घूम-घूम कर कीर्तन कर सनातन धर्म की अलख जगाती हैं। आश्रम के लोग कहते हैं उनकी आवाज में जादू है। ललिता मां को भी शुक्रवार को निर्मोही अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया गया। ललिता मां न सिर्फ साईं मां के आश्रम मेंं प्रशासन का काम देखती हैं बल्कि 'अवेकेंड लाइफ' नाम की संस्था भी चलाती हैं। विदेशी महिलाओंं को सनातन धर्म में प्रशिक्षित भी करती हैं।

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