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सत्ता के लिए अलग हो गए थे करवरिया बंधु
दुर्गेश पांडेय
Updated Mon, 16 Jan 2017 01:57 AM IST
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इलाहाबाद और कौशाम्बी की राजनीति में लंबे समय तक दखल रखने वाले करवरिया बंधु विधायक जवाहर यादव हत्याकांड के बाद लगे आरोपों से चर्चा में आए थे। परिवार भले ही एक रहा हो लेकिन सत्ता के लिए अलग-अलग दलों के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते भी। हालांकि 21 साल पुराने जवाहर पंडित हत्याकांड में करवरिया बंधु अभी जेल में हैं।
कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया व सूरजभान करवरिया ने अलग-अलग दलों से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। परिवार में अधिकांश समय तक भाइयों में राजनीतिक विरोध रहा, फिर भी तीनों भाई आपस में एक रहे। 2000 में कपिल मुनि करवरिया कौशाम्बी से जिला पंचायत अध्यक्ष बने और फिर उसके बाद बसपा के टिकट पर 2009 में फूलपुर से सांसद बने। वहीं उदयभान करवरिया 2002 व 2007 में बारा विधानसभा से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इसी के साथ ही छोटे भाई सूरजभान करवरिया 2005 में मंझनपुर से ब्लॉक प्रमुख रहे और 2010 में बसपा के टिकट पर इलाहाबाद-कौशाम्बी विधान परिषद क्षेत्र से एमएलसी चुने गए। करवरिया बंधु हमेशा सत्ता के करीब रहे। 21 साल पुराने जवाहर यादव हत्याकांड में करवरिया बंधु पर केस दर्ज हुआ था। इसी मामले में अभी तीनों भाई जेल में बंद हैं।
जेल में बंद होने के बाद भी करवरिया बंधु अपनी खोई हुई विरासत को वापस पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। कुछ ही महीने पहले भाजपा नेता वरुण गांधी उदयभान करवरिया से जेल में मिलने गए थे। तब से मेजा विधानसभा में उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया चुनाव प्रचार में जुट गई हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा ने नीलम करवरिया को टिकट दिया तो उनका मेजा विधानसभा से चुनाव लड़ना तय है।
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उदयभान ने साध ली थी चुप्पी
पूर्व विधायक उदयभान करवरिया इलाहाबाद में बीजेपी के बड़े नेता के रूप में जाने जाते हैं। 2010 के इलाहाबाद-कौशाम्बी विधान परिषद चुनाव में भाजपा ने रमेश पासी को टिकट दिया था। सपा से पूर्व केंद्रीय मंत्री रामपूजन पटेल मैदान में थे। वहीं उदयभान के भाई सूरजभान करवरिया बसपा से उम्मीदवार थे। कहा जाता है कि पूरे चुनाव में उदयभान ने भाजपा प्रत्याशी का प्रचार नहीं किया। उन्होंने चुप्पी साधे रखी। इस बात का पार्टी स्तर पर भी सवाल उठा लेकिन उदयभान ने भाई के खिलाफ प्रचार नहीं किया।
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कपिलमुनि करवरिया, उदयभान करवरिया व सूरजभान करवरिया ने अलग-अलग दलों से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। परिवार में अधिकांश समय तक भाइयों में राजनीतिक विरोध रहा, फिर भी तीनों भाई आपस में एक रहे। 2000 में कपिल मुनि करवरिया कौशाम्बी से जिला पंचायत अध्यक्ष बने और फिर उसके बाद बसपा के टिकट पर 2009 में फूलपुर से सांसद बने। वहीं उदयभान करवरिया 2002 व 2007 में बारा विधानसभा से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और जीत हासिल की। इसी के साथ ही छोटे भाई सूरजभान करवरिया 2005 में मंझनपुर से ब्लॉक प्रमुख रहे और 2010 में बसपा के टिकट पर इलाहाबाद-कौशाम्बी विधान परिषद क्षेत्र से एमएलसी चुने गए। करवरिया बंधु हमेशा सत्ता के करीब रहे। 21 साल पुराने जवाहर यादव हत्याकांड में करवरिया बंधु पर केस दर्ज हुआ था। इसी मामले में अभी तीनों भाई जेल में बंद हैं।
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जेल में बंद होने के बाद भी करवरिया बंधु अपनी खोई हुई विरासत को वापस पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। कुछ ही महीने पहले भाजपा नेता वरुण गांधी उदयभान करवरिया से जेल में मिलने गए थे। तब से मेजा विधानसभा में उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया चुनाव प्रचार में जुट गई हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा ने नीलम करवरिया को टिकट दिया तो उनका मेजा विधानसभा से चुनाव लड़ना तय है।
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उदयभान ने साध ली थी चुप्पी
पूर्व विधायक उदयभान करवरिया इलाहाबाद में बीजेपी के बड़े नेता के रूप में जाने जाते हैं। 2010 के इलाहाबाद-कौशाम्बी विधान परिषद चुनाव में भाजपा ने रमेश पासी को टिकट दिया था। सपा से पूर्व केंद्रीय मंत्री रामपूजन पटेल मैदान में थे। वहीं उदयभान के भाई सूरजभान करवरिया बसपा से उम्मीदवार थे। कहा जाता है कि पूरे चुनाव में उदयभान ने भाजपा प्रत्याशी का प्रचार नहीं किया। उन्होंने चुप्पी साधे रखी। इस बात का पार्टी स्तर पर भी सवाल उठा लेकिन उदयभान ने भाई के खिलाफ प्रचार नहीं किया।