स्मृति शेष : न्याय, शिक्षा और गंगा के प्रति निष्ठावान रहे न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय, दादी ने रखा था नाम
महामना के बेटे और निजी सचिव के रूप में परिवार और देश की सेवा करने वाले पिता पंडित गोविंद मालवीय और विषम परिस्थितियों में भी विनम्रता और समर्पण के साथ परिवार तथा देश की सेवा करने वाली मां ऊषा मालवीय से मिले संस्कार ने गिरिधर मालवीय में भी सेवा और समर्पण का संस्कार भर दिया था।
विस्तार
नहीं पता था कि सोमवार की सुबह एक ऐसी खबर आएगी, जिसे सहसा स्वीकार करना संभव नहीं। शिथिल शरीर लेकिन स्वस्थ मन से शताब्दी की ओर बढ़ रहे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के यशस्वी पौत्र न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने आंखें मूंद लीं। अभी चार दिन पहले ही तो 88 बरस के हुए थे। उनका जाना मालवीय परिवार ही नहीं प्रयागराज, काशी सहित पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति है।
महामना के बेटे और निजी सचिव के रूप में परिवार और देश की सेवा करने वाले पिता पंडित गोविंद मालवीय और विषम परिस्थितियों में भी विनम्रता और समर्पण के साथ परिवार तथा देश की सेवा करने वाली मां ऊषा मालवीय से मिले संस्कार ने गिरिधर मालवीय में भी सेवा और समर्पण का संस्कार भर दिया था।
पांचवीं बेटी सत्या के बाद कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा गोवर्धन पूजन के दिन 14 नवंबर 1936 को गिरिधर मालवीय का जन्म हुआ था। दादी (महामना की पत्नी) गंगा नहाने गई थीं। लौटने पर गिरिधर के जन्म का समाचार मिला तो गदगद हो उठीं। बोली गोवर्धन पूजा के दिन नारायण स्वयं गिरिधर के रूप में आए हैं और बालक का नाम गिरिधर पड़ गया।
गिरिधर का जन्म महामना के कमरे में ही हुआ था, संभवत इसीलिए उनका स्वभाव भी कुछ-कुछ महामना की तरह ही मृदु रहा। लगभग 8 वर्ष की उम्र में उनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ, फिर महामना ने ही उन्हें दीक्षा दी। महामना इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रख्यात वकील थे। पिता पंडित गोविंद मालवीय चाहते थे कि गिरिधर भी वकील बनें और आगे चलकर ऊंचे पद पर पहुंचें।
आठ मार्च 1988 की शाम मुख्य न्यायाधीश अमिताभ बैनर्जी का फोन आया तो मां ऊषा मालवीय ने ही फोन उठाया और गिरिधर को बुलाया। मुख्य न्यायाधीश ने फोन पर ही बताया कि गिरिधर हाईकोर्ट के जज हो गए हैं। गिरिधर ने मां के पांव छुए और पिताजी के चित्र के पास जाकर कहा, आपकी इच्छा पूरी हो गई। फिर 14 मार्च को उन्होंने हाईकोर्ट में न्यायाधीश का दायित्व संभाला। बतौर न्यायाधीश उनका कार्य और कार्यकाल अनुकरणीय और स्मरणीय रहा।
शहर के साहित्यिक और सामाजिक समारोह में उनकी प्रतिबद्धता और उपस्थिति अनिवार्य थी। राष्ट्र प्रेम, शिक्षा और न्याय के प्रति समर्पित न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय का गंगा के प्रति अद्भुत समर्पण रहा। वह संपूर्ण गंगा आंदोलन के केंद्र बिंदु रहे। गंगा महासभा के संरक्षक के तौर पर उनकी देखरेख में ही अविरल-निर्मल गंगा के लिए जिस गंगा विधेयक का मसौदा तैयार किया गया, तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने महासभा को पत्र भेजकर उसका समर्थन किया। और तो और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय नदी गंगा संरक्षण अधिनियम के लिए न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय की अध्यक्षता में ही ड्राफ्टिंग कमेटी बनाई गई। उनका जाना गंगा आंदोलन के लिए भी अपूरणीय क्षति है।
गंगा यात्रा
अविरल-निर्मल गंगा के लिए 6 नवंबर 2006 को न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने वाराणसी के राजेंद्र घाट पर धरना भी दिया। इसी के बाद गंगा आंदोलन पुनर्जीवित हुआ।
वर्ष 2008 में बलिया से नोएडा तक बनने वाले गंगा एक्सप्रेस-वे को न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय के मार्गदर्शन में ही न्यायिक प्रक्रिया के द्वारा रद्द कराया गया था।
हिन्दी का एक समर्पित सिपाही चला गया
न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त के बाद यह राष्ट्रभाषा हिन्दी के सन्दर्भ में दूसरा बड़ा झटका है शहर के लिए। गिरिधर मालवीय अपनी हिन्दी के बहुत लायक सपूत थे। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की विरासत को जीवन मूल्य की तरह जीने वाले गिरधर मालवीय के मन में संगम नगरी ही जैसे सांस लेती थी, इसीलिए अक्सर उनका समन्वयवादी दृष्टिकोण अभिभूत कर जाया करता था। वो हर किसी से खुलकर मिलते थे। मैंने जब भी उन्हें देखा, सांस्कृतिक चिंताओं से भरा हुआ पाया। बदलते हुए शहर को लेकर वह प्रायः बेचैन हो उठते थे और कहते थे कि अपना प्रयाग तो करुणा की देवी महादेवी का शहर है। महाप्राण निराला की कविताएं यहां सांस लेती हैं, कविवर सुमित्रानंदन पंत के छंद यहां की आत्मा में बसते हैं, फिर आख़िर क्यों कैलाश गौतम जैसे संवेदनशील कवि को यह कहना पड़ता है...
संतों में हम प्रयाग खोजते रहे, धुआं-धुआं वही आग खोजते रहे
जनकवि कैलाश गौतम उनके भी बहुत प्रिय कवि थे। एक बार जब वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हुए तो मैं और कैलाश गौतम उन्हें देखने गए तो अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े ही उन्होंने कैलाश गाैतम से उनकी कालजयी कविता अमवसा का मेला सुनाने का आग्रह किया और कविता सुनकर बोले कि अब मैं अच्छा हो जाऊंगा, मुझे बीमारी में कविता रूपी दवा की अच्छी डोज़ मिल गई है।
कहा करते थे कि बीमार हो रही सभ्यता का हमारी संस्कृति ही बेहतर उपचार कर सकती है और कविता तो हमें एक नेक आदमी बनाती ही है, हमारे मानसिक स्वास्थ्य को एक ऊंचाई दे देती है।वह सही अर्थों में धार्मिक थे और इस बात पर यक़ीन करते थे कि वस्तुतः जो धारण किया जाय, वही धर्म होता है। इसलिए भी वह धर्म के नाम पर पाखंड रचने वालों को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। जातिगत संकीर्णताओं पर भी वह प्रहार करते थे और कहते थे कि सबसे बड़ा धर्म है, मानव धर्म।
हिन्दी, गंगा, राम, मां और देश, यह पांच तत्व, उनके लिए विशेष महत्व रखते थे, यही उनके तपस्वी जीवन के मूलाधार भी थे। वह अजातशत्रु थे बल्कि उन्हें महामानव भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनके लिए कोई छोटा बड़ा नहीं था, वह सबसे समान रूप से मिलते थे। उनके न रहने से अपना इलाहाबाद कुछ और सूना हुआ है। अवध की माटी और बनारस की आबोहवा को आत्मसात करते हुए उन्होंने एक अर्थपूर्ण जीवन जिया। जो सोदेश्य जीवन जिया, वो भला कैसे मर सकता है। फिर उसे श्रद्धांजलि क्या देना। वह हमेशा जीवित रहेंगे हमारी यादों में।
अंतिम समय कई परेशानियों से जूझते रहे पर विचलित नहीं हुए
पिता तुल्य न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय का जाना आहत कर गया। उनके परिवार से हमारा घनिष्ठ संबंध रहा है। उन्होंने जिस जीवंतता के साथ जीवन का निर्वाह किया, वह अद्भुत और अतुलनीय है। वह जीवन के अंतिम समय में कई परेशानियों से जूझते रहे, लेकिन कभी विचलित नहीं हुए।
पिता श्रद्धेय न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त के साथ मैं इटावा से 1971 में प्रयागराज आया, तब पिताजी डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट थे। तब गिरिधर मालवीय इलाहाबाद के सबसे स्मार्ट, तेज-तर्रार वकीलों में गिने जाते थे। उस समय उनकी आयु 30-32 वर्ष रही होगी।
एक बार जब वह पिताजी से मिलने मेरे घर आए और मैंने उन्हें पहली बार देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। उनके चेहरे पर अद्भुत आभा थी। वह पिताजी से तकरीबन सात आठ वर्ष छोटे थे। उनसे उनका अग्रज और अनुज का संबंध रहा। जॉर्जटाउन में उनका बड़ा सा बंगला है। मैं पिताजी के साथ प्राय: अपने चर्चलेन वाले घर से उनके घर जाया करता था।
वह पिताजी को इतना आदर देते थे कि बड़ी बेटी की शादी के सिलसिले में जब बरेली में तैनात तत्कालीन डीएम आईएएस प्रियदर्शी से मिलने उनके घर गए तो आग्रह करके पिताजी को साथ ले जाना नहीं भूले। मुलाकात के बाद कहा था, इस रिश्ते को तब तक मंजूरी नहीं मिलेगी, जब तक आपकी स्वीकृति नहीं मिल जाती। पिताजी की सहमति के बाद प्रियदर्शी से बड़ी बेटी का विवाह हुआ। अमितदीप मोटर्स परिवार में छोटी बेटी का ब्याह हुआ तो बेटा भी आईपीएस रहा।
महामना का पौत्र होने के कारण ही हमेशा उनसे वैसे ही बड़प्पन की अपेक्षा रही और वह इस कसौटी पर हमेशा खरे भी उतरे. पिताजी जब गवर्नमेंट एडवोकेट बने तो गिरिधर चाचा भी डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट थे। वर्ष 1977 में पिताजी हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने, तब गिरिधर चाचा शासकीय अधिवक्ता थे। बाद में वह भी हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने।
उच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश होने के कारण पिताजी कॉलेजियम में शामिल थे, इसी दौरान गिरिधर चाचा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। उनकी गिनती विद्वान न्यायाधीशों में की जाती थी। समाज, भारतीयता और राष्ट्र सेवा का जो संकल्प और संस्कार उन्हें परिवार से मिला था, उसका उन्होंने आजीवन निर्वाह किया।
हिंदी के प्रति प्रेम के कारण ही पिताजी ने उन्हें इटावा हिंदी सेवा निधि के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी। वह अनेक महत्वपूर्ण आयोजनों में सदैव पिताजी के साथ ही मंच पर रहे।(न्यायमूर्ति अशोक कुमार, अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग)
न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय जी अपने दादा महामना मालवीय की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। उनके द्वारा सनातन के प्रति किए गए कार्य सदा याद रखे जाएंगे। -स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, वरिष्ठ सदस्य, राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र न्यास
न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय में अपने दादा महामना के गुण स्थानांतरित हुए. उन्होंने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके निधन से गंगा आंदोलन और सनातन धर्म को अपूरणीय क्षति हुई है। -स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती, राष्ट्रीय महामंत्री, गंगा महासभा
वह पिताजी अश्क साहब के विचारों और लेखन के गहरे मुरीद और पारिवारिक मित्र थे, वहीं नीलाभ जी को भारत और इलाहाबाद वापस लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। न केवल इलाहाबाद का बौद्धिक वर्ग, बल्कि हाईकोर्ट और पूरे शहर से एक बड़ी विरासत छिन गई। उनकी स्मृतियों को विनम्र श्रद्धांजलि। -भूमिका अश्क, लेखिका