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मौत के मुंह में धकेल रहे झोलाछाप
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
Updated Tue, 09 Dec 2014 11:55 PM IST
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झोलाछाप डॉक्टरों की अज्ञानता व इलाज के दौरान लापरवाही के चलते आए दिन मरीज मौत के मुंह में समा जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले में प्रतिवर्ष एक लाख गर्भवती महिलाओं में से 283 महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। इसमें कई मौतें डॉक्टरों की लापरवाही के चलते होती है। जहां तक बच्चों का सवाल है तो प्रति एक हजार बच्चों मेें से 81 बच्चे जान गंवा देते हैं। इन आंकड़ों से इतर एसआरएन, बेली, काल्विन व डफरिन जैसे सरकारी अस्पतालों के अलावा शहर के 450 से अधिक नर्सिंगहोम में प्रतिमाह 25 से 30 मरीजों की मौत हो जाती है जिनका इलाज झोलाछाप डॉक्टर पहले ही कर चुके होते हैं। गलत इलाज के चलते मरीज पहले ही बेहद गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचता है जहां उसे बचा पाना बेहद मुश्किल होता है।
मेडिकल कालेज के बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. डीके सिंह के मुताबिक चिल्ड्रेन अस्पताल में प्रतिदिन दो सौ के करीब बच्चे इलाज कराने पहुंचते हैं। जिसमें से 20 से 25 गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती करना होता है। प्रतिमाह औसतन 15-20 बच्चों की इलाज के दौरान मौत हो जाती है। जिसमें से अधिकतर बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं। जबकि 15 से 20 बच्चे ऐसे होते हैं जिनका इलाज पहले देहात क्षेत्र में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा किया गया होता है। ऐसे डॉक्टरों की लापरवाही के चलते बच्चा इतनी गंभीर स्थिति में होता है कि उसे बचाना मुश्किल होता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज के चलते जहां मरीज जान गंवा रहे हैं वहीं स्वास्थ्य विभाग ने ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ कभी भी ठोस अभियान नही चलाया। अलबत्ता कागजी खानापूर्ति की। नर्सिंगहोम संचालित करने वाले बड़े झोलाछाप डॉक्टर फिर भी कार्रवाई से बच गए। विभागीय स्तर पर देहात क्षेत्र के गंगापार व यमुनापार में 94 झोलाछाप डॉक्टर चिह्नित भी किए गए। सीएमओ ने सभी डिप्टी सीएमओ को ऐसे सभी नर्सिंगहोम को बंद कराने के साथ ही डॉक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का भी निर्देश दिया। लेकिन अभी तक न तो किसी डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और न ही नर्सिंगहोम बंद कराया गया।
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मेडिकल कालेज के बालरोग विभागाध्यक्ष डॉ. डीके सिंह के मुताबिक चिल्ड्रेन अस्पताल में प्रतिदिन दो सौ के करीब बच्चे इलाज कराने पहुंचते हैं। जिसमें से 20 से 25 गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती करना होता है। प्रतिमाह औसतन 15-20 बच्चों की इलाज के दौरान मौत हो जाती है। जिसमें से अधिकतर बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं। जबकि 15 से 20 बच्चे ऐसे होते हैं जिनका इलाज पहले देहात क्षेत्र में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा किया गया होता है। ऐसे डॉक्टरों की लापरवाही के चलते बच्चा इतनी गंभीर स्थिति में होता है कि उसे बचाना मुश्किल होता है।
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चौंकाने वाली बात यह है कि झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज के चलते जहां मरीज जान गंवा रहे हैं वहीं स्वास्थ्य विभाग ने ऐसे डॉक्टरों के खिलाफ कभी भी ठोस अभियान नही चलाया। अलबत्ता कागजी खानापूर्ति की। नर्सिंगहोम संचालित करने वाले बड़े झोलाछाप डॉक्टर फिर भी कार्रवाई से बच गए। विभागीय स्तर पर देहात क्षेत्र के गंगापार व यमुनापार में 94 झोलाछाप डॉक्टर चिह्नित भी किए गए। सीएमओ ने सभी डिप्टी सीएमओ को ऐसे सभी नर्सिंगहोम को बंद कराने के साथ ही डॉक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का भी निर्देश दिया। लेकिन अभी तक न तो किसी डॉक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और न ही नर्सिंगहोम बंद कराया गया।
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