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जवाहर बाग कांड ः हाईकोर्ट ने पूछा दो साल तक क्या करती रही सरकार
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 19 Jul 2016 02:25 AM IST
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मथुरा के जवाहर बाग कांड की सीबीआई जांच पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। पूछा है कि जवाहर बाग पर धरना-प्रदर्शन के नाम पर कब्जा होने के बाद दो साल तक सरकार क्या करती रही। बाग की गतिविधियों को लेकर मिलने वाली शिकायतों पर क्या कदम उठाए गए। रामवृक्ष यादव के समर्थकों पर मारपीट करने की जो एफआईआर दर्ज हैं, उनमें विवेचना की क्या स्थिति है। कोर्ट ने महाधिवक्ता को अगली सुनवाई पर इन सभी बातों का पूरा ब्यौरा अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई एक अगस्त को होगी।
याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति आरएन कक्कड़ की पीठ ने महाधिवक्ता से पूछा कि जनवरी 2014 में रामवृक्ष यादव को जवाहर बाग में प्रदर्शन के लिए जो अनुमति दी गई उसकी प्रकृति क्या थी, ऐसा किस प्रकार से संभव हुआ कि दो दिन की अनुमति लेकर वह लोग दो वर्षों से जमे रहे। उनको हटाने के लिए क्या कदम उठाए गए। जिला प्रशासन द्वारा जवाहर बाग को लेकर जो रिपोर्ट भेजी जाती रही है, उस पर शासन ने क्या कदम उठाए हैं। पीठ ने इस दो वर्ष की अवधि में मथुरा में तैनात रहे जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों की सूची भी मांगी है।
पूछा है कि वन विभाग और पुलिस कर्मियों की ओर से रामवृक्ष के समर्थकों पर 14 एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। इन सभी में जांच कहां तक पहुंची है। याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं का कहना था कि शासन के दबाव में स्थानीय अधिकारी मूकदर्शक बनकर सब कुछ देखते रहे। मीडिया में इन घटनाओं को लेकर लगातार रिपोर्ट छपती रही। यदि मीडिया की रिपोर्ट झूठी है तो सरकार और प्रशासन ने ऐसी गलत रिपोर्ट छापने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार की दलील थी कि याचिकाकर्ता के पास आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है। याचिका मात्र मीडिया की रिपोर्ट को आधार बनाकर दाखिल की गई है इसलिए इसे खारिज किया जाए।
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याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति आरएन कक्कड़ की पीठ ने महाधिवक्ता से पूछा कि जनवरी 2014 में रामवृक्ष यादव को जवाहर बाग में प्रदर्शन के लिए जो अनुमति दी गई उसकी प्रकृति क्या थी, ऐसा किस प्रकार से संभव हुआ कि दो दिन की अनुमति लेकर वह लोग दो वर्षों से जमे रहे। उनको हटाने के लिए क्या कदम उठाए गए। जिला प्रशासन द्वारा जवाहर बाग को लेकर जो रिपोर्ट भेजी जाती रही है, उस पर शासन ने क्या कदम उठाए हैं। पीठ ने इस दो वर्ष की अवधि में मथुरा में तैनात रहे जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों की सूची भी मांगी है।
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पूछा है कि वन विभाग और पुलिस कर्मियों की ओर से रामवृक्ष के समर्थकों पर 14 एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। इन सभी में जांच कहां तक पहुंची है। याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं का कहना था कि शासन के दबाव में स्थानीय अधिकारी मूकदर्शक बनकर सब कुछ देखते रहे। मीडिया में इन घटनाओं को लेकर लगातार रिपोर्ट छपती रही। यदि मीडिया की रिपोर्ट झूठी है तो सरकार और प्रशासन ने ऐसी गलत रिपोर्ट छापने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार की दलील थी कि याचिकाकर्ता के पास आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है। याचिका मात्र मीडिया की रिपोर्ट को आधार बनाकर दाखिल की गई है इसलिए इसे खारिज किया जाए।
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