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रेरा अथॉरिटी पर अहम फैसला - रेरा के एक सदस्य द्वारा सुनवाई करना वैध : हाईकोर्ट
Sat, 23 Jan 2021 01:07 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 23 Jan 2021 01:07 AM IST
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allahabad high court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि रियल इस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) के एक सदस्य द्वारा की गई सुनवाई और आदेश को अवैध नहीं कहा जा सकता है। हालांकि रेरा की सुनवाई अध्यक्ष व न्यूनतम दो सदस्यों से पूर्ण होती है। अध्यक्ष के न रहने पर दो सदस्य शिकायत की सुनवाई कर सकते हैं। यदि एक सदस्य के शिकायत सुनने पर कंपनी इसकी अधिकारिता पर आपत्ति न करके मौन रहती है तो बाद में सदस्य के आदेश को अधिकारिता के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि एक सदस्य द्वारा की गई सुनवाई और कार्रवाई को अवैध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि रेरा एक्ट का गठन पीड़ित को तत्काल राहत देने के उद्देश्य से किया गया है। ऐसे में प्रमोटर सिविल कोर्ट के जरिये वसूली की कार्यवाही करने की बात नहीं कह सकता है। ऐसा करने से रेरा के गठन का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। इसलिए बकाए की वसूली राजस्व प्रक्रिया के माध्यम से करने का आदेश उचित है। कोर्ट ने कहा कि बकाया वसूली के अलावा अन्य मामले में रेरा के आदेश के खिलाफ अपील का उपबंध है। याची अपील दाखिल कर सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति एमएन भंडारी तथा न्यायमूर्ति आरआर अग्रवाल की खंडपीठ ने मेसर्स प्राविड रियल इस्टेट प्रा. लि व मेसर्स एमआर जेवी कांस्ट्रक्शन कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
याची कंपनी ने 2012में फ्लैट बुक करते समय इसका कब्जा 2017 में सौंपने का करार किया था। करार पूरा न होने पाने रेरा ने कंपनी से मूलधन 25 लाख 36 हजार 985 रुपये की वसूली आदेश दिया। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कहा कि आदेश के खिलाफ अपील होगी। किंतु एक सदस्य ने आदेश दिया है। जिसे अधिकारिता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि पद खाली है तो एक सदस्य द्वारा की गई कार्रवाई अवैध नहीं होगी। कोर्ट ने बकाया वसूली पर कहा कि दो तरीके से वसूली नहीं हो सकती। मूल धन के लिए सिविल कोर्ट व दंड, मुआवजा, ब्याज के लिए राजस्व वसूली की अलग प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती।
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कोर्ट ने कहा कि रेरा एक्ट का गठन पीड़ित को तत्काल राहत देने के उद्देश्य से किया गया है। ऐसे में प्रमोटर सिविल कोर्ट के जरिये वसूली की कार्यवाही करने की बात नहीं कह सकता है। ऐसा करने से रेरा के गठन का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। इसलिए बकाए की वसूली राजस्व प्रक्रिया के माध्यम से करने का आदेश उचित है। कोर्ट ने कहा कि बकाया वसूली के अलावा अन्य मामले में रेरा के आदेश के खिलाफ अपील का उपबंध है। याची अपील दाखिल कर सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति एमएन भंडारी तथा न्यायमूर्ति आरआर अग्रवाल की खंडपीठ ने मेसर्स प्राविड रियल इस्टेट प्रा. लि व मेसर्स एमआर जेवी कांस्ट्रक्शन कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
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याची कंपनी ने 2012में फ्लैट बुक करते समय इसका कब्जा 2017 में सौंपने का करार किया था। करार पूरा न होने पाने रेरा ने कंपनी से मूलधन 25 लाख 36 हजार 985 रुपये की वसूली आदेश दिया। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कहा कि आदेश के खिलाफ अपील होगी। किंतु एक सदस्य ने आदेश दिया है। जिसे अधिकारिता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि पद खाली है तो एक सदस्य द्वारा की गई कार्रवाई अवैध नहीं होगी। कोर्ट ने बकाया वसूली पर कहा कि दो तरीके से वसूली नहीं हो सकती। मूल धन के लिए सिविल कोर्ट व दंड, मुआवजा, ब्याज के लिए राजस्व वसूली की अलग प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती।
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