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Hindi Rang Manch Diwas :शहजादी नौटंकी सफर जारी, जनता से है रिश्तेदारी

Fri, 03 Apr 2026 06:47 PM IST
विनोद सिंह शशांक वर्मा, प्रयागराज
शशांक वर्मा, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 03 Apr 2026 06:47 PM IST
सार

जनसरोकार की वजह से लोकनाट्य परंपरा की विशिष्ट शैली नौटंकी आज भी समाज से रिश्ता बनाए हुए है। यह कला इसलिए भी जीवित है कि इसके मंचन में दर्शक भी एक किरदार होता।

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Hindi Rang Manch Diwas: Shahzadi Nautanki's journey continues, has a relationship with the public
विश्व रंगमंच दिवस। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

जनसरोकार की वजह से लोकनाट्य परंपरा की विशिष्ट शैली नौटंकी आज भी समाज से रिश्ता बनाए हुए है। यह कला इसलिए भी जीवित है कि इसके मंचन में दर्शक भी एक किरदार होता। जनता की हुंकारी अभिनेता के डॉयलाग पूरा करती है। स्वतंत्रता आंदोलन में प्रतिरोध को स्वर देने वाली नौटंकी आज घर-घर के झगड़ों को सुलझाने का रास्ता दिखा रही है। कलाकारों को कहना है कि अमर सिंह राठौर, भक्त पूरनमल, सुल्ताना डाकू जैसे नाटक आज भी पसंद किए जा रहे हैं लेकिन नए विषय भी तलाशने होंगे। इन सबके बावजूद यह भी सच है कि वैश्विक दौर में मंडलियां अपना मजबूत आर्थिक आधार बनाने के लिए तड़प रही हैं। 

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प्रयागराज। प्रयागराजी (पूर्व में इलाहाबाद) नौटंकी की विरासत में आंदोलन लिखा है। प्रख्यात कलाकार जगेश्वर सैदाबाद में पुलिया उड़ाने के प्रयास में अंग्रेजों की गोली से शहीद हो गए थे। मां जंजीरों में, प्रताप का विलाप, जुल्मी डायर जैसे नाटकों ने अंग्रेजी हुकूमत के नाक में दम कर रखा था। आजादी के बाद दौर बदला तो सामाजिक समस्याएं मंच पर उतरने लगीं। प्रयागराज में सइदागंज, मोहमजिया, गधियांव, मुंडेरा, फाफामऊ, शाहगंज, सुलेम सराय, नीवां, सहसों, फूलपुर में 1901 से पूर्व नौटंकी परंपरा थी।

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पं. रामराज त्रिपाठी ने अपने गुरु लाला कल्याण चंद के निधन के बाद श्रीराम सांगीत मंडली का गठन कर प्रस्तुतियां आरंभ की थीं। खेल आज भी जारी है। फूलपुर क्षेत्र में मेवालाल के निर्देशन में नाटक भैया-भाभी का सितम, मां-बेटे की कसम तालियां बटोर रहा है। बहरिया क्षेत्र में समाज का कलंक दहेज नाटक के माध्यम से दीपचंद्र प्रजापति सामाजिक कुरीति के खिलाफ लोगों को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।

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नौटंकी के मंच से संबोधित करते थे प.नेहरू

लोकनाट्य में जनभागीदारी को देखते हुए जंग-ए-आजादी के दौर में पं. जवाहर लाल नेहरू नौटंकी खत्म होने के बाद सुबह मंच पर जाकर जनता को संबोधित करते थे। जनता को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करते थे।

मंडली के साथ रहे लाल बहादुर शास्त्री

एक आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों की सरकार लाल बहादुर शास्त्री को खोज रही थी, तब नौटंकी मंडली के साथ रहकर शास्त्री जी ने करीब दो महीने बिताए थे। इस दौरान उन्होंने कई स्थान बदले।

किस्सा शहजादी नौटंकी का

शहजादी नौटंकी मुल्तान के एक बादशाह की बेटी का नाम था। वह फूल की तरह थी, उसे फूलों से तौला जाता तो कभी नौ टका (सिक्कों) से भी। इस किस्से की नाटकीय प्रस्तुति से नौटंकी नाम प्रचलन में आ गया। लोकनाट्य के शिल्पकार राजकुमार श्रीवास्तव और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की डॉ. हैन्सन कैथरीन ने इसका उल्लेख अपने शोध में किया है।

हबीबुन बाई को कोकिला का खिताब

इलाहाबाद (प्रयागराज) में 1934-35 के आसपास नौटंकी में हबीबुन का पहली महिला कलाकार के रूप में प्रवेश हुआ। हालांकि, वह बहराइच, लखनऊ, सीतापुर क्षेत्र में पहले से अभिनय कर रही थीं। यहां एक प्रतियोगी प्रस्तुति में हार के बाद वह यहीं की हो गईं। उनके गायन से प्रभावित होकर नेहरू ने उन्हें कोकिला बाई का खिताब दिया था।

नृत्य पर पैसा गिरने लगा और चोट कला को पहुंची

नौटंकी के ताजा हालात पर स्वर्ग रंगमंडल के निर्देशक अतुल यदुवंशी कहते हैं कि भले ही इस कला को फूहड़ बनाने की कोशिश की गई लेकिन कामयाब नहीं हुई। उन्होंने बताया कि सीन बदलने के कुछ तैयारियां की जाती हैं। ऐसे में दर्शकों को बांधे रखने के लिए नृत्य का आयोजन होता है। हुआ यह कि इस दौरान लोग मंच पर पैसे फेंकने लगे। इससे आयोजकों को लगा कि नृत्य कुछ देर को बढ़ा दिया। इस तरह के प्रयासों से फूहड़ता का प्रवेश होने लगा। लेकिन ऐसा कुछ ही जगहों पर होता है। आज भी सीरियस नाटक हो रहे हैं, जो पसंद किए जा रहे हैं। वह बताते हैं कि वर्ष 2004 में जब पाकिस्तान के लौहार में उन्होंने बंटवारे की आग नाटक प्रस्तुत किया तो दर्शकों ने बहुत सराहा। कहानी तो दो भाइयों की बीच की थी, पर जनता को संदेश समझ में आ ही गया कि यह दो भाई नहीं, दो देश हैं।

मौलिकता को बचाना बड़ी चुनौती

हिंदी रंगमंच के विकास पर शोध कर रहे ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के छात्र रत्नेश कुमार कहते हैं कि सिनेमा के विभिन्न रूपों की छाया लोकनाट्य पर पड़ रही है। अच्छी सामग्री को अपनाने से गुरेज नहीं करना चाहिए। बशर्ते वह लोक कला की मौलिकता को नुकसान न पहुंचाए। यह एक बड़ी चुनौती है।

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