{"_id":"6adc5bcfceb13042a506f7ab","slug":"high-court-magistrate-taking-cognizance-under-the-sc-st-act-does-not-render-the-entire-proceedings-invalid-2026-10-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"हाईकोर्ट : एससी-एसटी एक्ट में मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने से पूरी कार्यवाही अमान्य नहीं, यह है पूरा मामला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हाईकोर्ट : एससी-एसटी एक्ट में मजिस्ट्रेट के संज्ञान लेने से पूरी कार्यवाही अमान्य नहीं, यह है पूरा मामला
Sat, 24 Oct 2026 12:48 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 24 Oct 2026 12:48 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि एससी-एसटी एक्ट के मामले में मजिस्ट्रेट की ओर से शुरुआती स्तर पर संज्ञान लेने और शिकायतकर्ता-गवाह के बयान दर्ज करने से पूरी आपराधिक कार्यवाही स्वतः अमान्य नहीं हो जाती।
विज्ञापन
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि एससी-एसटी एक्ट के मामले में मजिस्ट्रेट की ओर से शुरुआती स्तर पर संज्ञान लेने और शिकायतकर्ता-गवाह के बयान दर्ज करने से पूरी आपराधिक कार्यवाही स्वतः अमान्य नहीं हो जाती। प्रक्रियात्मक अनियमितता के आधार पर कार्यवाही तभी निरस्त की जा सकती है, जब उससे किसी पक्ष को नुकसान पहुंचा हो या न्याय प्रक्रिया प्रभावित हुई हो।
विज्ञापन
इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने अजय यादव और दो अन्य की ओर से समन आदेश रद्द करने की मांग में दायर अपील खारिज कर दी। अपीलकर्ताओं ने बलिया की एससी-एसटी विशेष अदालत की ओर से 22 मई 2019 को जारी समनिंग आदेश को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि एससी-एसटी एक्ट की धारा-14 के तहत विशेष अदालत को सीधे संज्ञान लेने का अधिकार है। ऐसे में मजिस्ट्रेट की ओर से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-200 और 202 के तहत कार्यवाही करना कानून के अनुरूप नहीं था। इसलिए बाद में जारी समनिंग आदेश भी निरस्त किया जाना चाहिए।
विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2016 के संशोधन के बाद एससी-एसटी एक्ट की धारा-14 के तहत विशेष अदालत को बिना मजिस्ट्रेट से मामला सौंपे सीधे संज्ञान लेने का अधिकार मिला है। हालांकि, मजिस्ट्रेट की शुरुआती कार्यवाही में प्रक्रियात्मक अनियमितता मात्र से बाद की पूरी कार्यवाही अमान्य नहीं हो जाती।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शांताबेन भुरभाई भुरिया बनाम आनंद अथाभाई चौधरी मामले के फैसले का हवाला दिया। कहा कि समन जारी करने के चरण में मिनी ट्रायल नहीं किया जा सकता। इस स्तर पर आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण आवश्यक नहीं है। अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि अनियमितता से न्याय की विफलता हुई है। इसी के साथ अपील खारिज कर दी।
समनिंग आदेश: अदालत की ओर से जारी किया जाने वाला एक औपचारिक कानूनी आदेश है। जब किसी आपराधिक या सिविल मामले में अदालत को लगता है कि आरोपी, गवाह या पक्षकार को अपने समक्ष बुलाना या उसका पक्ष सुनना आवश्यक है, तब यह आदेश जारी किया जाता है।