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हाईकोर्ट की टिप्पणी : फैसले की घड़ी में नए अधिवक्ता की ओर से पैरवी शर्मनाक, यह परंपरा वकालत पेशे के लिए कलंक

Mon, 27 May 2024 11:42 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 27 May 2024 11:42 AM IST
सार

न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की कोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी करने के साथ ही गौतमबुद्ध नगर के शिवकुमार वर्मा की याचिका खारिज कर दी। साथ ही बार काउंसिल और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को इस शर्मनाक स्थिति पर गंभीरता से विचार करने और अंकुश लगाने की सलाह दी।

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High Court comment: Advocacy by a new advocate at the time of decision is shameful, this tradition is a disg
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दलीलें पूरी होने के बाद ठीक फैसले के वक्त नए वकील की पैरवी पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह परंपरा वकालत जैसे सम्मानजनक पेशे के लिए कलंक है।

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न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की कोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी करने के साथ ही गौतमबुद्ध नगर के शिवकुमार वर्मा की याचिका खारिज कर दी। साथ ही बार काउंसिल और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को इस शर्मनाक स्थिति पर गंभीरता से विचार करने और अंकुश लगाने की सलाह दी।

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कोर्ट ने कहा, एक अधिवक्ता की ओर से बहस पूरी करने और अदालत के मंतव्य को भांप कर दूसरे अधिवक्ता का मुकदमा अपने हाथ में लेना विधि व्यवसाय की विश्वसनीयता और गरिमा को ठेस पहुंचाने के समान है। यह आचरण व्यावसायिक परंपरा के लिए कलंक है।

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इससे निपटने के लिए बार काउंसिल और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को संयुक्त रूप से मंथन करना चाहिए। वकालत में शुरू हुई इस परिपाटी को खत्म करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। मामला गौतम बुद्ध नगर के फेज 2 थाना क्षेत्र का है। याची और विपक्षी के बीच व्यावसायिक लेनदेन के दौरान चेक का आदान प्रदान हुआ था। याची की ओर से विपक्षी को दिया गया आठ लाख का चेक अनादृत हो गया था। आरोप है कि चेक अनादर की सूचना देने पहुंचे विपक्षी को याची ने रुपये देने से इन्कार करने के साथ ही उसके साथ बदसलूकी भी की।

इस पर विपक्षी ने लीगल नोटिस भेजा था, जिसका याची ने न जवाब दिया और न ही पैसे लौटाए। इस पर विपक्षी ने जिला अदालत में वाद दाखिल किया था जिसका संज्ञान लेते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट ने याची के खिलाफ समन जारी किया था।

याची ने समन को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। करीब दो वर्ष से लंबित इस मामले के पहले अधिवक्ता ने अपनी बहस पिछली तारीख पर पूरी कर ली थी, लेकिन अदालत की ओर से राहत मिलने की संभावना नजर नहीं आई तो ऐन फैसले की घड़ी में एक अन्य अधिवक्ता ने अपना वकालतनामा दाखिल कर दलील पेश करने की गुजारिश की, जिससे अदालत खफा है।

हालांकि, कोर्ट ने मामले का निस्तारण गुणदोष के आधार पर करते हुए कहा, मामला तथ्यों पर आधारित है, जिस पर विचार करने का क्षेत्राधिकार ट्रायल कोर्ट का है। इस मामले में हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता। लिहाजा, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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