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हाईकोर्ट : जमानत देने का अधिकार मजिस्ट्रेट का, न्यायिक निर्देशों से नहीं छीन सकते विवेकाधिकार

Sun, 01 Nov 2026 06:02 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 01 Nov 2026 06:02 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जमानत पर रिहाई मामले में मजिस्ट्रेट के वैधानिक विवेकाधिकार को न्यायिक निर्देशों के जरिये सीमित या समाप्त नहीं किया जा सकता।

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High Court authority to grant bail lies with magistrate; judicial directives cannot strip away
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जमानत पर रिहाई मामले में मजिस्ट्रेट के वैधानिक विवेकाधिकार को न्यायिक निर्देशों के जरिये सीमित या समाप्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने आरोपपत्र दाखिल होने के बाद आरोपियों को बिना जमानत अर्जी दिए निजी मुचलके पर रिहा करने और जमानतदारों की संख्या निर्धारित करने से जुड़े पूर्व के निर्देशों पर असहमति जताते हुए उनकी वैधता का प्रश्न बड़ी पीठ को संदर्भित किया है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अरुण कुमार की ओर से दाखिल जमानत निरस्तीकरण अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया। याची ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, औरैया के दो मई 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत विपक्षी संख्या दो से चार को एक-एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर बिना जमानतदार के रिहा करने की अनुमति दी गई थी। निचली अदालत ने यह आदेश हाईकोर्ट के बच्ची देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए निर्देशों के आधार पर पारित किया था।
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हाईकोर्ट ने बच्ची देवी मामले में दिए गए तीन निर्देशों की वैधता पर सवाल उठाए। इनमें आरोपपत्र दाखिल होने के बाद आरोपी के अदालत में पेश होने पर बिना जमानत अर्जी के निजी मुचलके पर रिहाई, मुकदमे के दौरान गिरफ्तारी से संरक्षण जारी रखने और दो जमानतदारों के स्थान पर एक जमानतदार को अनिवार्य करने से जुड़े निर्देश शामिल हैं।
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कोर्ट ने कहा कि जमानत देने का निर्णय संबंधित अदालत को मामले के तथ्यों, अपराध की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर करना होता है। सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में उपयुक्त परिस्थितियों में आरोपी को बांड पर रिहा किया जा सकता है, लेकिन इसे हर मामले में उसका असीमित अधिकार नहीं माना जा सकता। वहीं, जमानतदारों की संख्या तय करने के मामले में भी कानून अदालत को विवेकाधिकार देता है। न्यायिक निर्देशों के जरिये इस अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने रजिस्ट्रार को आदेश तीन दिन के भीतर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। बड़ी पीठ के निर्णय के बाद मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

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