जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में भी जातीय फैक्टर, अपनों को जोड़े रखने की चुनौती
- जिला पंचायत सदस्य के निर्वाचन में तीन बिरादरी के लोगों की प्रभावी संख्या
- अनुसूचित जाति के सदस्यों की बढ़ी भूमिका, दिग्गजों को साधने की कवायद शुरू
विस्तार
जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भी जाति बड़ा फैक्टर बनने जा रहा है। इसमें तीन जातियों की प्रभावी संख्या है। इस आधार पर भाजपा और सपा दोनों ही तरफ से जीत के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में जीत के दावों तथा जातीय समीकरण के बीच अनुसूचित जाति वर्ग के जिला पंचायत सदस्यों की भूमिका बढ़ गई है। इस जातीय समीकरण को साधने के लिए दिग्गज नेताओं की घेराबंदी भी शुरू हो गई है।
जिले में कुल 84 जिला पंचायत सदस्य हैं। इस चुनाव में जाति फैक्टर को इससे ही समझा जा सकता है कि सपा और भाजपा दोनों दलों की ओर से सदस्यों की जातिवार सूची तैयार की गई है। यादव बिरादरी के 20 से अधिक सदस्य निर्वाचित हुए हैं। वहीं पटेल बिरादरी के 13 सदस्य निर्वाचित हुए हैं। अनुसूचित जाति के सदस्यों की संख्या 22 है। सर्वण बिरादरी के निर्वाचित सदस्यों की संख्या करीब एक दर्जन है। इसे ध्यान में रखकर चुनाव की रणनीति बनाई जा रही है। साथ ही जीत के दावे किए जा रहे हैं।
हालांकि, जाति के आधार पर मतों के ध्रुवीकरण की कवायद के बीच सपा और भाजपा के सामने एका बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ गई है। खासतौर पर, यमुनापार के दो दिग्गज नेताओं की भूमिका को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। कई निर्वाचित सदस्यों पर इनका अधिक प्रभाव होने की बात कही जा रही है। इनमें से एक सपा के वरिष्ठ नेता है तो दूसरे भाजपा में हैं। जानकारों का कहना है कि सियासी पृष्टभूमि को देखते हुए दोनों ही नेताओं को जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति रास नहीं आएगी। ऐसे में दोनों दलों के सामने इन नेताओं को भी मनाने की चुनौती है। इसके अलावा जीत के लिए 43 सदस्यों के समर्थन की जरूरत है। ऐसे में अनुसूचित जाति के निर्वाचित 22 सदस्यों के रुख पर सभी की नजर है।
केशरी और रेखा के बगैर 21 वर्ष बाद होगा अध्यक्ष का चुनाव
जिला पंचायत अध्यक्ष के 26 वर्ष के इतिहास में 21 वर्ष बाद ऐसा होगा जब सांसद केशरी देवी पटेल और रेखा सिंह के बिना चुनाव होगा। जिला पंचायत का गठन 1995 में हुआ था। इससे पहले जिला परिषद हुआ करता था। 1995 के चुनाव में जनता दल के विश्राम दास अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। उन्होंने कांग्रेस समर्थित पूर्व सांसद राम निहोर राकेश की पत्नी को हराया था।इसके बाद वर्ष 2000 के चुनाव में केशरी देवी पटेल अध्यक्ष निर्वाचित हुईं थीं। इसके बाद 2005 के चुनाव से ही केशरी देवी और रेखा सिंह के बीच मुकाबला होता रहा। केशरी देवी बसपा तथा रेखा सिंह सपा के समर्थन से चुनाव लड़ती रहीं और 2020 तक यह सिलसिला चला। हालांकि बदलते राजनीतिक परिदृश्य में दोनों नेता इस समय भाजपा में हैं और करीब 21 वर्ष बाद इनमें से कोई अध्यक्ष पद का चुनाव भी नहीं लड़ रहा। हालांकि, रेखा सिंह जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुई हैं और भाजपा की ओर से उन्हें प्रबल उम्मीदवार भी माना जा रहा था लेकिन भाजपा ने वीके सिंह को मैदान में उतार दिया है।