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इलाहाबाद विश्वविद्यालय : बायोकेमेस्ट्री विभागाध्यक्ष को कारण बताओ नोटिस, शोधार्थियों और शिक्षकों ने लगाए गंभीर आरोप
Tue, 12 Jan 2021 02:22 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 12 Jan 2021 02:22 AM IST
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय
- फोटो : अमर उजाला
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के बायोकेमेस्ट्री के विभागाध्यक्ष प्रो. डीके गुप्ता को इविवि प्रशासन ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। उन्हीं के विभाग के शोधार्थियों एवं कुछ शिक्षकों ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं और कुलपति से भी शिकायत की है। शिकायत के आधार पर विभागाध्यक्ष को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही मामले की जांच के लिए डीन साइंस प्रो. शेखर श्रीवास्तव की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन भी कर दिया गया है।
प्रो. डीके गुप्ता वर्ष 2014 से 2016 तक बिहार की छपरा यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रह चुके हैं। कुलपति रहते हुए उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे और उन्हें बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ने कुलपति के पद से हटा दिया था। इसके बाद इविवि में उनकी वापसी हुई। पूर्व कुलपति प्रो. रतन लाल हांगलू ने पहले तो प्रो. गुप्ता को निलंबित करने का आदेश दिया और बाद में उन्हें निलंबन से बहाल करते हुए दिसंबर-2019 में विभागाध्यक्ष बना दिया।
इसी के बाद से विभाग में अंसतोष फैलने लगा। सूत्रों के मुताबिक पिछले साल विभाग में वाटर प्यूरीफायर लगवाने की मांग को लेकर कुछ शिक्षक और छात्र विभागाध्यक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने शिक्षकों और शोधार्थियों से एक-एक हजार रुपये अंशदान के लिए कहा। एक शोधार्थी ने विरोध किया तो उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। साथ ही उस नोटिस में इविवि प्रशासन के लिए ‘लाल फीताशाही’ जैसे शब्द का प्रयोग किया।
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शोधार्थी का कहना था कि इसके लिए इविवि प्रशासन से बजट की मांग की जाए। छात्र अपनी जेब से पैसा कैसे देंगे। एक शोधार्थी का आरोप है कि वह जहां भी नौकरी के लिए गया, विभागाध्यक्ष ने उसके खिलाफ रिपोर्ट लगा दी और उसका चयन नहीं हो सका। उस शोधार्थी ने एक हजार रुपये देने का विरोध किया था।
इसके साथ ही कुछ शिक्षकों ने भी आरोप लगाया है कि विभागाध्यक्ष ने उन पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वे अपने शोधार्थियों से शिकायत वापस लेने के लिए कहें और उन शिक्षकों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो उन्हें भी प्रताड़ित किया गया। सूत्रों का यह भी कहना है कि विभाग को जिनोमिक सेंटर के रूप में मिले करोड़ों के प्रोजेक्ट को बंद करने के लिए विभागाध्यक्ष ने सरकार को पत्र लिख दिया था।
शिकायत करने वाले शिक्षकों एवं शोधार्थियों का कहना है कि इससे इविवि की छवि पर खराब असर पड़ा है। सूत्रों का कहना है कि ऐसे ही तमाम बिंदुओं पर इविवि प्रशासन ने उनसे जवाब मांगा है।
‘शिकायत के आधार पर बायोकेमेस्ट्री विभागाध्यक्ष को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है।’ -डॉ. जया कपूर, पीआरओ, इविवि
‘विभाग में कुछ शिक्षक शोधार्थियों की आड़ में राजनीति कर रहे हैं। इससे विश्वविद्यालय की छवि खराब होती है। ऐसे शिक्षकों पर शोध में कंटेंट चोरी करने का आरोप है। मेरे ऊपर लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं।’ -प्रो. डीके गुप्ता, विभागाध्यक्ष, बायोकेमेस्ट्री
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प्रो. डीके गुप्ता वर्ष 2014 से 2016 तक बिहार की छपरा यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रह चुके हैं। कुलपति रहते हुए उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे और उन्हें बिहार के तत्कालीन राज्यपाल ने कुलपति के पद से हटा दिया था। इसके बाद इविवि में उनकी वापसी हुई। पूर्व कुलपति प्रो. रतन लाल हांगलू ने पहले तो प्रो. गुप्ता को निलंबित करने का आदेश दिया और बाद में उन्हें निलंबन से बहाल करते हुए दिसंबर-2019 में विभागाध्यक्ष बना दिया।
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इसी के बाद से विभाग में अंसतोष फैलने लगा। सूत्रों के मुताबिक पिछले साल विभाग में वाटर प्यूरीफायर लगवाने की मांग को लेकर कुछ शिक्षक और छात्र विभागाध्यक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने शिक्षकों और शोधार्थियों से एक-एक हजार रुपये अंशदान के लिए कहा। एक शोधार्थी ने विरोध किया तो उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। साथ ही उस नोटिस में इविवि प्रशासन के लिए ‘लाल फीताशाही’ जैसे शब्द का प्रयोग किया।
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शोधार्थी का कहना था कि इसके लिए इविवि प्रशासन से बजट की मांग की जाए। छात्र अपनी जेब से पैसा कैसे देंगे। एक शोधार्थी का आरोप है कि वह जहां भी नौकरी के लिए गया, विभागाध्यक्ष ने उसके खिलाफ रिपोर्ट लगा दी और उसका चयन नहीं हो सका। उस शोधार्थी ने एक हजार रुपये देने का विरोध किया था।
इसके साथ ही कुछ शिक्षकों ने भी आरोप लगाया है कि विभागाध्यक्ष ने उन पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वे अपने शोधार्थियों से शिकायत वापस लेने के लिए कहें और उन शिक्षकों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो उन्हें भी प्रताड़ित किया गया। सूत्रों का यह भी कहना है कि विभाग को जिनोमिक सेंटर के रूप में मिले करोड़ों के प्रोजेक्ट को बंद करने के लिए विभागाध्यक्ष ने सरकार को पत्र लिख दिया था।
शिकायत करने वाले शिक्षकों एवं शोधार्थियों का कहना है कि इससे इविवि की छवि पर खराब असर पड़ा है। सूत्रों का कहना है कि ऐसे ही तमाम बिंदुओं पर इविवि प्रशासन ने उनसे जवाब मांगा है।
‘शिकायत के आधार पर बायोकेमेस्ट्री विभागाध्यक्ष को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया है।’ -डॉ. जया कपूर, पीआरओ, इविवि
‘विभाग में कुछ शिक्षक शोधार्थियों की आड़ में राजनीति कर रहे हैं। इससे विश्वविद्यालय की छवि खराब होती है। ऐसे शिक्षकों पर शोध में कंटेंट चोरी करने का आरोप है। मेरे ऊपर लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं।’ -प्रो. डीके गुप्ता, विभागाध्यक्ष, बायोकेमेस्ट्री