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इविवि में मिली अंग्रेजों के समय की बंदूक
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Allahabad University
- फोटो : CITY DESK
40 किलो है बंदूक का वजन, ईस्ट इंडिया कंपनी के समय के होने का अनुमान
मध्यकालीन इतिहास के तहखाने में पाई गई बंदूक बढ़ाएगी संग्रहालय की शोभा
प्रयागराज। इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के तहखाने में अंग्रेजों के समय की बंदूक मिली है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह बंदूक ईस्ट इंडिया कंपनी के समय की है। यह बंदूक अब विभाग के संग्रहालय की शोभा बढ़ाएगी। साथ ही विभाग के विशेषज्ञ इसके विभिन्न पहलुओं पर शोध भी करेंगे।
इविवि परिसर के जिस हिस्से में बंदूक मिली है, वहां किसी जमाने में पायनियर प्रेस हुआ करती थी। मध्यकालीन इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रो. योगेश्वर तिवारी के अनुसार उन्होंने जब तहखाने की साफ-सफाई कराई तो वहां से 40 किलोग्राम वजन की यह बंदूक मिली। यह बंदूक 1857 के आसपास की है। इस पर फरसी के शब्दों में कुछ लिखा हुआ है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि यह बंदूक देश में ही तैयारी की गई होगी। तकरीबन डेढ़ सौ साल पुरानी बंदूक की लोहे की नाल अब भी काफी मजबूत है।
वहीं, लकड़ी का बना बट भी अब तक मजबूत है। हालांकि उसका कुछ हिस्सा खराब हो चुका है। प्रो. तिवारी के मुताबिक इस बंदूक के बारे में कुलपति एवं रजिस्ट्रार को सूचना दे दी गई है और इसको सुरक्षित तरीके से रखवा दिया गया है। उन्होंने बताया कि अक्तूबर से विभाग का संग्रहालय शुरू होने जा रहा है। इस बंदूक को उसी संग्रहालय में रखवा दिया जाएगा। बताया कि विभाग के संग्रालय में कई अन्य दुलर्भ संग्रह भी किए जाएंगे।
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मध्यकालीन इतिहास के तहखाने में पाई गई बंदूक बढ़ाएगी संग्रहालय की शोभा
प्रयागराज। इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के तहखाने में अंग्रेजों के समय की बंदूक मिली है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह बंदूक ईस्ट इंडिया कंपनी के समय की है। यह बंदूक अब विभाग के संग्रहालय की शोभा बढ़ाएगी। साथ ही विभाग के विशेषज्ञ इसके विभिन्न पहलुओं पर शोध भी करेंगे।
इविवि परिसर के जिस हिस्से में बंदूक मिली है, वहां किसी जमाने में पायनियर प्रेस हुआ करती थी। मध्यकालीन इतिहास के विभागाध्यक्ष प्रो. योगेश्वर तिवारी के अनुसार उन्होंने जब तहखाने की साफ-सफाई कराई तो वहां से 40 किलोग्राम वजन की यह बंदूक मिली। यह बंदूक 1857 के आसपास की है। इस पर फरसी के शब्दों में कुछ लिखा हुआ है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि यह बंदूक देश में ही तैयारी की गई होगी। तकरीबन डेढ़ सौ साल पुरानी बंदूक की लोहे की नाल अब भी काफी मजबूत है।
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वहीं, लकड़ी का बना बट भी अब तक मजबूत है। हालांकि उसका कुछ हिस्सा खराब हो चुका है। प्रो. तिवारी के मुताबिक इस बंदूक के बारे में कुलपति एवं रजिस्ट्रार को सूचना दे दी गई है और इसको सुरक्षित तरीके से रखवा दिया गया है। उन्होंने बताया कि अक्तूबर से विभाग का संग्रहालय शुरू होने जा रहा है। इस बंदूक को उसी संग्रहालय में रखवा दिया जाएगा। बताया कि विभाग के संग्रालय में कई अन्य दुलर्भ संग्रह भी किए जाएंगे।
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