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Prayagraj News: पीड़िता के शरीर पर बाहरी चोट न होना दुष्कर्म के आरोप को झुठलाने का आधार नहीं

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 12 Jun 2026 02:21 AM IST
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A vast park in Rajrooppur's Nand Gaon is undergoing a transformation. This park is spread across 32 bighas.
हर मामले में पीड़िता के शरीर पर बाहरी चोट न होने के आधार पर दुष्कर्म के आरोप को झूठा नहीं ठहराया जा सकता। इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा को जेल में बिताई गई अवधि में बदल दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकलपीठ ने हबीब की अपील पर दिया।
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बरेली निवासी याची हबीब पर वर्ष 1985 में नौ वर्षीय बालिका से दुष्कर्म का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए आठ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। याची अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई थी। गवाहियों में कुछ विरोधाभास थे और जब्त किए गए कपड़ों व मिट्टी की फोरेंसिक जांच भी नहीं कराई गई थी। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि मामूली विरोधाभासों या जांच की कुछ कमियों के आधार पर पूरे अभियोजन मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दुष्कर्म के हर मामले में पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिलना जरूरी नहीं है। कई बार उम्र, भय, दबाव या अन्य परिस्थितियों के कारण पीड़िता प्रतिरोध नहीं कर पाती, इसलिए चोटों का न होना सहमति या झूठे आरोप का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त हैं। आरोपी लगभग सात वर्ष की सजा पहले ही जेल में काट चुका है, जबकि उसे आठ वर्ष की सजा सुनाई गई थी। ऐसे में हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया। इस प्रकार अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई।
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