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Aligarh News: जेन-जी की जुबान पर चढ़ा ‘हम’, ‘मैं’ से बना रही दूरी
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एएमयू।
- फोटो : Archive
मोबाइल, सोशल मीडिया के दौर में जेन-जी केवल अपनी जीवनशैली और सोच में ही बदलाव नहीं ला रही, बल्कि भाषा को भी नया स्वरूप दे रही है। एएमयू के भाषा विज्ञान विभाग में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि शहर के युवाओं की बोलचाल तेजी से बदल रही है। बड़ी संख्या में युवा पारंपरिक ‘मैं’ की जगह स्थानीय अंदाज में ‘हम’ का प्रयोग कर रहे हैं, जो उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनता जा रहा है।
भाषा विज्ञानी सैयद इम्तियाज हसनैन और राजेश कुमार के निर्देशन में शोधार्थी आयशा सिराज द्वारा किए गए अध्ययन में अलीगढ़ के हिंदी-उर्दू भाषी युवाओं की भाषाई प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि करीब 60 प्रतिशत युवा ऐसे भाषाई रूपों का प्रयोग कर रहे हैं, जो पारंपरिक हिंदी व्याकरण से अलग हैं, लेकिन स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करते हैं।
अध्ययन के अनुसार जेन-जी भाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं मानती, बल्कि अपनी पहचान व्यक्त करने के साधन के रूप में भी देखती है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस बदलाव को और अधिक गति दी है। युवा स्थानीय बोलियों, हिंदी, उर्दू और इंटरनेट की भाषा को मिलाकर एक नया भाषाई स्वरूप गढ़ रहे हैं, जिससे वे अपनी क्षेत्रीय पहचान बनाए रखते हुए आधुनिक पीढ़ी से भी जुड़े रहते हैं।
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भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि अलीगढ़ की युवा पीढ़ी अपनी बोलचाल के माध्यम से यह संदेश दे रही है कि पहचान केवल नाम या पते से नहीं, बल्कि भाषा और अभिव्यक्ति के तरीके से भी बनती है। ‘मैं’ से ‘हम’ तक का यह बदलाव समाज और संस्कृति में हो रहे व्यापक परिवर्तनों का संकेत है।
बातचीत में अब युवा पीढ़ी मैं के बजाय हम का ज्यादा इस्तेमाल करने लगी है। मैं और हम केवल सर्वनाम नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान, वर्ग, क्षेत्रीय जुड़ाव और संबंधों को व्यक्त करने के सशक्त भाषाई उपकरण हैं।
-प्रो. एमजे वारसी, अध्यक्ष, भाषा विज्ञान विभाग, एएमयू
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भाषा विज्ञानी सैयद इम्तियाज हसनैन और राजेश कुमार के निर्देशन में शोधार्थी आयशा सिराज द्वारा किए गए अध्ययन में अलीगढ़ के हिंदी-उर्दू भाषी युवाओं की भाषाई प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि करीब 60 प्रतिशत युवा ऐसे भाषाई रूपों का प्रयोग कर रहे हैं, जो पारंपरिक हिंदी व्याकरण से अलग हैं, लेकिन स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करते हैं।
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अध्ययन के अनुसार जेन-जी भाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं मानती, बल्कि अपनी पहचान व्यक्त करने के साधन के रूप में भी देखती है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस बदलाव को और अधिक गति दी है। युवा स्थानीय बोलियों, हिंदी, उर्दू और इंटरनेट की भाषा को मिलाकर एक नया भाषाई स्वरूप गढ़ रहे हैं, जिससे वे अपनी क्षेत्रीय पहचान बनाए रखते हुए आधुनिक पीढ़ी से भी जुड़े रहते हैं।
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भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि अलीगढ़ की युवा पीढ़ी अपनी बोलचाल के माध्यम से यह संदेश दे रही है कि पहचान केवल नाम या पते से नहीं, बल्कि भाषा और अभिव्यक्ति के तरीके से भी बनती है। ‘मैं’ से ‘हम’ तक का यह बदलाव समाज और संस्कृति में हो रहे व्यापक परिवर्तनों का संकेत है।
बातचीत में अब युवा पीढ़ी मैं के बजाय हम का ज्यादा इस्तेमाल करने लगी है। मैं और हम केवल सर्वनाम नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान, वर्ग, क्षेत्रीय जुड़ाव और संबंधों को व्यक्त करने के सशक्त भाषाई उपकरण हैं।
-प्रो. एमजे वारसी, अध्यक्ष, भाषा विज्ञान विभाग, एएमयू