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जाति-धर्म नहीं कर्म देखकर डालंे वोट
अमर उजाला ब्यूूराे
Updated Wed, 08 Feb 2017 02:27 AM IST
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तालानगरी स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में अपने विचार व्यक्त करते शहर के प्रबुद्धजन।
- फोटो : Amar Ujala
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उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाली सच्चाई है। उनके इस कथन के आलोक में चुनाव के दौरान साहित्यकारों बुदि्धजीवियों का दायित्व और बढ़ जाता है। आम मतदाता की तरह सिफ मतदान करने से उनका दायित्व पूरा नहीं होता, उन पर समाज के विवेक को जगाने की जिम्मेदारी भी है ताकि मतदाता सही उम्मीदवार की पहचान कर सके।
मंगलवार को अमर उजाला कार्यालय, तालानगरी में आयोजित ‘संवाद’ में कवि सुरेश कुमार ने कहा कि जनप्रतिनिधि सांप्रदायिक नहीं, बल्कि मानवतावादी हो। उसकी छवि स्वच्छ व ईमानदार हो। शिक्षित होना निहायत जरूरी है। कहा, हवा के साथ न बहें। प्रत्याशी के बारे में जानिए और समझिए फिर उसे वोट करें। रही बात शहर की, तो गंदगी व जाम की समस्या काफी गंभीर है, जिसका निदान होना चाहिए।
साहित्यकार डॉ. नमिता सिंह ने कहा कि जितना मजबूत प्रतिपक्ष होगा, उतनी जल्दी समस्याओं का निदान होगा। जनप्रतिनिधि को सुरक्षा चक्र से निकलना होगा, क्यों कि जब जनता उनसे मिलने जाती है, तो उसे सुरक्षाकर्मी ही झिड़क देते हैं। विधायक अपनी कार्यप्रणाली तय करें कि वे जनसेवक हैं। धर्म-जाति के नाम पर समाज का विभाजन बंद होना चाहिए। जनप्रतिनिधि ऐसा होना चाहिए जो विकास भी कराए और समाज में सद्भाव भी बढ़ाये।
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एएमयू के असिस्टेंट प्रोफेसर व साहित्यकार डॉ. पंकज पराशर बताते हैं कि जनता के असली मुद्दे तो चुनावी मुद्दे बन ही नहीं पाते हैं। सांप्रदायिकता सिर्फ दूसरे संप्रदाय के खिलाफ ही नहीं, हर तरह की उदारता के खिलाफ है। समाज में नफरत फैलाई जा रही है। विकास के सही मॉडल को लोग नहीं जान सके हैं। लगभग सभी दल सत्ता की राजनीति खेल रहे हैं। ऐसे में बुदि्धजीवियों पर बड़ी जिम्मेदारी है कि अच्छे प्रत्याशियों के बारे में आमजन को बताएं।
कवि अशोक अंजुम कहते हैं कि हम लोगों को वोट की ताकत को पहचानना होगा। जाति व धर्म की आंधी में अच्छे व ईमानदार प्रत्याशी उड़ जाते हैं, इसलिए हमें पांच साल तक अपने फैसले पर पछताना पड़ता है। किसी को भी पानी व पर्यावरण की चिंता नहीं है। सब लगे हैं अपनी सियासी गोटियां सेट करने में। जलस्तर नीचे जा रहा है, जो मुद्दा नहीं बना।
एसवी कॉलेज के शिक्षक डॉ. ओमवीर सिंह का कहना है कि शिक्षा के जरिये बहुत सी समस्याओं का समाधान हो सकता है। कहा, विश्वविद्यालय की मांग पूरी नहीं हो रही है, इस पर कोई प्रयास नहीं कर रहा है। धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले पर प्रतिबंध लगे, उसे चुनाव लड़ने की मनाही हो। किसानों की तकलीफ सुनी नहीं जा रही है।
एसवी कॉलेज के शिक्षक डॉ. वीपी पांडेय बताते हैं कि नए सिरे से अब जनप्रतिनिधियों को अपनी भूमिका अदा करनी होगी। वे भाग्यविधाता नहीं हैं, बल्कि जनसेवक बनना पड़ेगा, इसमें मतदाताओं की अहम भूमिका होनी चाहिए। इस मामले में बुद्घिजीवियों को भी चिंतन करना होगा, अन्यथा प्रदेश व देश की स्थिति और भी बदतर हो जाएगी।
एसवी कॉलेज से सेवानिवृत्त डॉ. विशन बहादुर सक्सेना कहते हैं कि प्रजातंत्र के प्राण मतदाताओं में जागरूकता नहीं है। वे जाति व धर्म के दलदल में फंसकर उसे चुन लेते हैं, जिसका इलाके के विकास से कोई सरोकार नहीं रहता है। जनप्रतिनिधि में कार्य के क्रियान्वयन व निर्णय लेने में क्षमता हो। नीतिगत फैसले लेने में सलाहियत हो।
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मंगलवार को अमर उजाला कार्यालय, तालानगरी में आयोजित ‘संवाद’ में कवि सुरेश कुमार ने कहा कि जनप्रतिनिधि सांप्रदायिक नहीं, बल्कि मानवतावादी हो। उसकी छवि स्वच्छ व ईमानदार हो। शिक्षित होना निहायत जरूरी है। कहा, हवा के साथ न बहें। प्रत्याशी के बारे में जानिए और समझिए फिर उसे वोट करें। रही बात शहर की, तो गंदगी व जाम की समस्या काफी गंभीर है, जिसका निदान होना चाहिए।
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साहित्यकार डॉ. नमिता सिंह ने कहा कि जितना मजबूत प्रतिपक्ष होगा, उतनी जल्दी समस्याओं का निदान होगा। जनप्रतिनिधि को सुरक्षा चक्र से निकलना होगा, क्यों कि जब जनता उनसे मिलने जाती है, तो उसे सुरक्षाकर्मी ही झिड़क देते हैं। विधायक अपनी कार्यप्रणाली तय करें कि वे जनसेवक हैं। धर्म-जाति के नाम पर समाज का विभाजन बंद होना चाहिए। जनप्रतिनिधि ऐसा होना चाहिए जो विकास भी कराए और समाज में सद्भाव भी बढ़ाये।
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एएमयू के असिस्टेंट प्रोफेसर व साहित्यकार डॉ. पंकज पराशर बताते हैं कि जनता के असली मुद्दे तो चुनावी मुद्दे बन ही नहीं पाते हैं। सांप्रदायिकता सिर्फ दूसरे संप्रदाय के खिलाफ ही नहीं, हर तरह की उदारता के खिलाफ है। समाज में नफरत फैलाई जा रही है। विकास के सही मॉडल को लोग नहीं जान सके हैं। लगभग सभी दल सत्ता की राजनीति खेल रहे हैं। ऐसे में बुदि्धजीवियों पर बड़ी जिम्मेदारी है कि अच्छे प्रत्याशियों के बारे में आमजन को बताएं।
कवि अशोक अंजुम कहते हैं कि हम लोगों को वोट की ताकत को पहचानना होगा। जाति व धर्म की आंधी में अच्छे व ईमानदार प्रत्याशी उड़ जाते हैं, इसलिए हमें पांच साल तक अपने फैसले पर पछताना पड़ता है। किसी को भी पानी व पर्यावरण की चिंता नहीं है। सब लगे हैं अपनी सियासी गोटियां सेट करने में। जलस्तर नीचे जा रहा है, जो मुद्दा नहीं बना।
एसवी कॉलेज के शिक्षक डॉ. ओमवीर सिंह का कहना है कि शिक्षा के जरिये बहुत सी समस्याओं का समाधान हो सकता है। कहा, विश्वविद्यालय की मांग पूरी नहीं हो रही है, इस पर कोई प्रयास नहीं कर रहा है। धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले पर प्रतिबंध लगे, उसे चुनाव लड़ने की मनाही हो। किसानों की तकलीफ सुनी नहीं जा रही है।
एसवी कॉलेज के शिक्षक डॉ. वीपी पांडेय बताते हैं कि नए सिरे से अब जनप्रतिनिधियों को अपनी भूमिका अदा करनी होगी। वे भाग्यविधाता नहीं हैं, बल्कि जनसेवक बनना पड़ेगा, इसमें मतदाताओं की अहम भूमिका होनी चाहिए। इस मामले में बुद्घिजीवियों को भी चिंतन करना होगा, अन्यथा प्रदेश व देश की स्थिति और भी बदतर हो जाएगी।
एसवी कॉलेज से सेवानिवृत्त डॉ. विशन बहादुर सक्सेना कहते हैं कि प्रजातंत्र के प्राण मतदाताओं में जागरूकता नहीं है। वे जाति व धर्म के दलदल में फंसकर उसे चुन लेते हैं, जिसका इलाके के विकास से कोई सरोकार नहीं रहता है। जनप्रतिनिधि में कार्य के क्रियान्वयन व निर्णय लेने में क्षमता हो। नीतिगत फैसले लेने में सलाहियत हो।