बेबस प्रशासन: आयोजक-मुहल्ले वाले भिड़े, हुई धक्कामुक्की, 48 साल बाद पुरानी राह पर मां काली मेला
पिछले वर्ष तक यह मेला देहली गेट से शुरू होकर कनवरीगंज से कटरा मोहल्ला में प्रवेश कर महावीरगंज में निकलता था। वहां से बारहद्वारी के रास्ते पत्थर बाजार, रेलवे रोड होकर अचलताल पहुंचता था। मगर इस बार आयोजकों व इलाके के कुछ भाजपा नेताओं ने मेला कनवरीगंज से कटरा के बजाय संवेदनशील कनवरीगंज फर्श से सब्जी मंडी-अब्दुल करीम चौराहा से महावीरगंज होकर निकालना तय किया।
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दुर्गा महारानी मंदिर सेवा समिति द्वारा नवमी के दिन निकाला जाने वाला मां काली मेला (शोभायात्रा) का आयोजन 6 अप्रैल को 48 वर्ष बाद फिर विवाद का कारण बन गया। यात्रा के मार्ग परिवर्तन को लेकर आयोजन समिति व इलाके के लोग दो खेमों में बंट गए। पुलिस प्रशासन ने भी मार्ग न बदलने की पुरजोर कोशिश की। मगर दो घंटे तक चले हंगामे-धक्कामुक्की के बीच मेला बदले हुए मार्ग से ही निकाला गया। इसे लेकर पुलिस प्रशासन के भी हाथ पांव फूले रहे। मगर मेला सकुशल निकलने पर सभी ने राहत की सांस ली।
शहर का यह मेला काफी प्राचीन व परंपरागत है। पिछले वर्ष तक यह मेला देहली गेट से शुरू होकर कनवरीगंज से कटरा मोहल्ला में प्रवेश कर महावीरगंज में निकलता था। वहां से बारहद्वारी के रास्ते पत्थर बाजार, रेलवे रोड होकर अचलताल पहुंचता था। मगर इस बार आयोजकों व इलाके के कुछ भाजपा नेताओं ने मेला कनवरीगंज से कटरा के बजाय संवेदनशील कनवरीगंज फर्श से सब्जी मंडी-अब्दुल करीम चौराहा से महावीरगंज होकर निकालना तय किया।
मेला शुभारंभ के समय पुलिस प्रशासनिक अफसर देहली गेट पर पहुंच गए। आयोजकों को समझाना शुरू किया कि मार्ग न बदला जाए। कनवरीगंज की ओर आरएएफ के साथ बेरीकेट लगा दिए गए। मगर आयोजक जिद पर अड़ गए। साथ में तमाम भाजपाई भी वहां आ गए। अधिकारियों के समक्ष घंटों की बहस व बातचीत के बाद भी वे जिद पर अड़े रहे। इसी बीच कटरा मोहल्ले के कुछ लोग आए। उन्होंने कहा कि मेला उनके मोहल्ले से होकर निकलता है। वे मार्ग नहीं बदलने देंगे। इस पर विवाद बढ़ गया।
मार्ग बदलने के विरोध में आए लोग बीच रास्ते पर जम गए। कहने लगे कि वे दूसरी ओर मेला नहीं जाने देंगे। इन लोगों ने मेला में शामिल झांकियों के कर्मचारियों व गाने बजाने वालों से खींचतान कर धक्कामुक्की कर दी। एक दूसरे के विरोध में नारेबाजी तक हो गई। मगर इसी बीच पूर्व मेयर शकुंतला भारती वहां पहुंच गईं। उन्होंने एक एक कर सभी झांकियां नए मार्ग की ओर निकलवाईं। पुलिस बल व अधिकारी सब देखते रह गए। फिर मेला नए रास्ते पर चल पड़ा। देर रात सकुशल अपने गंतव्य को जारी रहा। इस दौरान तमाम भाजपाई वहां रहे।
पिछले वर्ष दुर्घटना के कारण बदला मार्ग
आयोजकों का कहना था कि मेला पिछले वर्ष तक कटरा मोहल्ले में होकर निकलता था। मगर अब कटरा मोहल्ले में गलियां ज्यादा संकरी हो गई हैं। झांकियों व बैंड आदि की ऊंचाई बढ़ गई हैं। इसके चलते पिछले वर्ष चार युवक करंट से झुलस गए थे, जबकि खुद काली स्वरूप भी दो पोलों में फंसने से दुर्घटना होने से बची थी। अगर दुर्घटना बड़ी हो जाती तो आयोजक फंसते। इसलिए मार्ग बदलना तय किया गया।
विरोधियों के ये तर्क
विरोध करने वालों का कहना था कि काली स्वरूप प्रतिवर्ष उनके दरवाजे से निकलता था और आरती होती थी। इस परंपरा को न बदला जाए। इसी बात का वे विरोध कर रहे थे।
दंगे के चलते 1978 में बदला था मेला मार्ग
इस मेले के पुराने इतिहास पर ध्यान दें तो वर्ष 1977 तक मेला इसी मार्ग से निकलता था, जिस मार्ग से आज निकला है। मगर 1978 में भूरा पहलवान की हत्या के बाद हुए दंगे के चलते मार्ग बदला गया था। उसी वर्ष से मेला कटरा की ओर से निकाला जा रहा था। चूंकि उस समय दंगा चार वर्ष तक रुक रुककर चला था। इसलिए लगातार उसी मार्ग से निकाला जाता रहा। तब से अब तक कटरा मार्ग से ही निकल रहा था।

पुलिस प्रशासन ने मेला नए मार्ग से न निकले, इसके पूरे प्रयास किए। मगर हमने प्रशासन की चुनौती स्वीकारते हुए मेला नए मार्ग से निकालना तय किया और नए मार्ग से निकाला। मेला सकुशल निकला। हम समाज के लिए हर चुनौती स्वीकारने को राजी हैं।-शकुंतला भारती, पूर्व मेयर, अलीगढ़
मेले के रास्ते को लेकर दो पक्षों में आपस का विवाद था। उसी लिहाज से हमने सुरक्षा इंतजाम किए थे। दोनों अलग अलग रास्तों से मेला निकालना चाह रहे थे। हमने समझाने का प्रयास किया। मगर मेला नए मार्ग से निकाला गया। सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया।-मृगांक शेखर पाठक, एसपी सिटी, अलीगढ़