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तीन-तीन सर्कुलर से वन रैंक-वन पेंशन..
आशीष निगम
Updated Fri, 04 Nov 2016 01:23 AM IST
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Shahabuddin pension Babu District Soldier Welfare Board.
- फोटो : amar Ujala
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दिल्ली के इंडिया गेट पर रिटायर सैन्य कर्मी रामकिशन ग्रेवाल की खुदकुशी ने वन रैंक वन पेंशन पर देशव्यापी व्यापक बहस छेड़ दी है। क्योंकि मुद्दा तकरीबन 83 लाख देशवासियों से जुड़ा है, जो देश की सीमाओं की रक्षा के जिम्मेदार हैं। इसलिए सभी राजनीतिक दलों के लिए ये खास हो गया।
मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद ही अपने वादे को पूरा करने के लिए पहली जुलाई 2014 को वन रैंक वन पेंशन लागू करने की घोषणा कर दी। 4 फरवरी 2016 को इसका आर्डर कर सर्कुलर भी जारी कर दिया गया। तय हुआ कि पहली जुलाई 2014 से ही इसे लागू माना जाएगा। पेंशन बनी तो इसके साथ दो साल की बची हुई पुरानी अवशेष रकम का एरियर भी बना।
अब आई भुगतान की बारी। अभी खातों तक सब रकम पहुंचती कि पेंशन कार्यालय से लेकर बैंक तक सभी जगह भ्रम की स्थिति बन गई। ये भ्रम इसलिए पैदा हुआ कि तीनों सेनाओं के एक कैटेगरी के कर्मियों की एक टेबिल बना कर जारी कर दी गई। इसलिए आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के जवान एक ही श्रेणी में आ गए। जिसकी पेंशन बढ़ी उसे कोई ऐतराज नहीं, लेकिन जिसकी कम हुई उसने विरोध किया।
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इस विरोध पर दो संशोधन आर्डर जारी हुए। एक साथ तीन तीन आर्डर जारी होने से पेंशन विभाग से लेकर बैंक तक सब जगह भ्रम की स्थिति बनी है। इसलिए कहीं कम तो कहीं ज्यादा का भुगतान हो रहा है। जिला सैनिक कल्याण बोर्ड के पेंशन बाबू शहाबुद्दीन भी कहते हैं कि जब तक तीनों आर्डर की विस्तृत समीक्षा कर विसंगतियां दूर नहीं होंगी समस्याएं बनी रहेंगी।
दिल्ली में खुद को खत्म करने वाले रामकिशन ग्रेवाल ने कम पेंशन मिलने की शिकायत अलग-अलग कार्यक्रमों में तीन बार मुझसे भी की। 28 हजार की पेंशन उनका हक था, जबकि उन्हें 23 हजार का भुगतान हो रहा था। इसी टेंशन को वह बर्दाश्त नहीं कर पाए। हरियाणा के एक संगठन ने उनकी समस्या उठाई, लेकिन उस संगठन के प्रमुख से रक्षा मंत्रालय के कुछ अफसर नाराज थे। इसलिए उनकी पहल भी काम नहीं आई।
दरअसल, वन रैंक वन पेंशन लागू करने से पहले तीनाें सेनाओं के सभी श्रेणियों के कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व वाली एक राष्ट्रीय स्तर की कमेटी बना कर इस पर काम होना चाहिए था। अगर किसी की पेंशन बढ़ रही है तो किसी को परेशानी नहीं है, लेकिन किसी की कम नहीं होनी चाहिए।
जल्दबाजी में केवल ऐलान कर देने मात्र से खातों में हक का पूरा पैसा नहीं पहुंचता। उसकी पूरी व्यवस्था भी होनी चाहिए। केंद्र सरकार को अब भी इसकी पूरी मानीटरिंग भी करनी चाहिए। केंद्र सरकार की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ है।
-वीके गुप्ता, सेवानिवृत्त फ्लाइट इंजीनियर
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मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद ही अपने वादे को पूरा करने के लिए पहली जुलाई 2014 को वन रैंक वन पेंशन लागू करने की घोषणा कर दी। 4 फरवरी 2016 को इसका आर्डर कर सर्कुलर भी जारी कर दिया गया। तय हुआ कि पहली जुलाई 2014 से ही इसे लागू माना जाएगा। पेंशन बनी तो इसके साथ दो साल की बची हुई पुरानी अवशेष रकम का एरियर भी बना।
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अब आई भुगतान की बारी। अभी खातों तक सब रकम पहुंचती कि पेंशन कार्यालय से लेकर बैंक तक सभी जगह भ्रम की स्थिति बन गई। ये भ्रम इसलिए पैदा हुआ कि तीनों सेनाओं के एक कैटेगरी के कर्मियों की एक टेबिल बना कर जारी कर दी गई। इसलिए आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के जवान एक ही श्रेणी में आ गए। जिसकी पेंशन बढ़ी उसे कोई ऐतराज नहीं, लेकिन जिसकी कम हुई उसने विरोध किया।
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इस विरोध पर दो संशोधन आर्डर जारी हुए। एक साथ तीन तीन आर्डर जारी होने से पेंशन विभाग से लेकर बैंक तक सब जगह भ्रम की स्थिति बनी है। इसलिए कहीं कम तो कहीं ज्यादा का भुगतान हो रहा है। जिला सैनिक कल्याण बोर्ड के पेंशन बाबू शहाबुद्दीन भी कहते हैं कि जब तक तीनों आर्डर की विस्तृत समीक्षा कर विसंगतियां दूर नहीं होंगी समस्याएं बनी रहेंगी।
दिल्ली में खुद को खत्म करने वाले रामकिशन ग्रेवाल ने कम पेंशन मिलने की शिकायत अलग-अलग कार्यक्रमों में तीन बार मुझसे भी की। 28 हजार की पेंशन उनका हक था, जबकि उन्हें 23 हजार का भुगतान हो रहा था। इसी टेंशन को वह बर्दाश्त नहीं कर पाए। हरियाणा के एक संगठन ने उनकी समस्या उठाई, लेकिन उस संगठन के प्रमुख से रक्षा मंत्रालय के कुछ अफसर नाराज थे। इसलिए उनकी पहल भी काम नहीं आई।
दरअसल, वन रैंक वन पेंशन लागू करने से पहले तीनाें सेनाओं के सभी श्रेणियों के कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व वाली एक राष्ट्रीय स्तर की कमेटी बना कर इस पर काम होना चाहिए था। अगर किसी की पेंशन बढ़ रही है तो किसी को परेशानी नहीं है, लेकिन किसी की कम नहीं होनी चाहिए।
जल्दबाजी में केवल ऐलान कर देने मात्र से खातों में हक का पूरा पैसा नहीं पहुंचता। उसकी पूरी व्यवस्था भी होनी चाहिए। केंद्र सरकार को अब भी इसकी पूरी मानीटरिंग भी करनी चाहिए। केंद्र सरकार की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ है।
-वीके गुप्ता, सेवानिवृत्त फ्लाइट इंजीनियर