AMU: इसरो ने छोड़ा जीपीएस लगा मौसम गुब्बारा, जो बताएगा 200 किमी के मौसम का पूर्वानुमान, ये भी देगा जानकारी
गुब्बारे में करीब छह मीटर की रस्सी बंधी होती है, जिसकी अंतिम छोर पर रोडियोसोंड लगा है, जिसकी दाहिनी ओर लगे जीपीएस से लोकेशन की जानकारी मिलेगी। बायीं ओर सेंसर लगा है, जो तापमान, आर्द्रता, दबाव, हवाओं की दिशा-गति की जानकारी एकत्र कर बीच में लगे ट्रांसमीटर को देगा। ट्रांसमीटर भूगोल विभाग की छत पर लगे रिसीवर को डेटा भेजेगा, जो स्क्रीन पर प्रदर्शित होगा।
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) ने 11 जुलाई को इसरो के सहयोग से मौसम गुब्बारा आसमान में छोड़कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस गुब्बारे में लगे जीपीएस व अन्य उपकरणों के माध्यम से मौसम, तापमान, आर्द्रता और हवाओं की रफ्तार की गणना की जा सकेगी। इससे 200 किलोमीटर के क्षेत्र के मौसम का पूर्वानुमान हो सकेगा। गुब्बारा छोड़ने से पहले जिला व पुलिस और नागरिक उड्डयन विभाग से अनुमति ली गई थी।
11 जुलाई को भूगोल विभाग की छत से कुलपति प्रो. नईमा खातून और इसरो के वैज्ञानिकों ने गुब्बारा छोड़ा। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सलाहकार व वैज्ञानिक डॉ. जगवीर सिंह ने बताया कि यह गुब्बारा जैसे-जैसे ऊंचाइयां तय करता है, वैसे-वैसे उसका आकार बड़ा होता रहता है और 35 किलोमीटर ऊंचाई जाने के बाद फट जाता है। गुब्बारा में रस्सी के सहारे जीपीएस लगा है, जिससे तापमान, दबाव, आर्द्रता और हवाओं की गति मापेंगे, जो जलवायु अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करेगा। उन्होंने जलवायु अनुसंधान क्षमताओं को आगे बढ़ाने में अपनी पहल के लिए एएमयू की एक संस्था के रूप में भी सराहना की।
केंद्रीय विमानन मौसम विज्ञान प्रभाग, आईएमडी, भारत सरकार के प्रमुख व वैज्ञानिक डॉ. गजेंद्र सिंह ने बताया कि जीपीएस मॉड्यूल मौसम संबंधी अवलोकन प्रदान करता है, जो कृषि, सिंचाई, विमानन और अपतटीय तेल अन्वेषण जैसी मौसम-संवेदनशील गतिविधियों के लिए आवश्यक है। हैदराबाद स्थित एनआरएससी-इसरो के वैज्ञानिक डॉ. हरीफ बाबा ने बताया कि जो एएमयू से मौसम गुब्बारा छोड़ा गया है, वह एएमयू और एनआरएससी के बीच एनआईसीईएस कार्यक्रम के तहत करार का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जीपीएस का प्रक्षेपण एक सहयोगात्मक प्रयास है, जिसका उद्देश्य मौसम संबंधी शोध को बढ़ावा देना है। मौसम गुब्बारा छोड़ने की योजना वर्ष 2019 से थी।
मौसम गुब्बारा छोड़ना भूगोल विभाग की उपलब्धि : कुलपति
एएमयू की कुलपति प्रो. नईमा खातून ने कहा कि भूगोल विभाग से मौसम गुब्बारा छोड़ा जाना एक उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि विभाग के लिए यह दुर्लभ उपलब्धि है, क्योंकि यह एक नई पहल के रूप में अपना पहला मौसम गुब्बारा छोड़ कर शताब्दी वर्ष का जश्न मना रहा है। विज्ञान संकाय के डीन प्रो. कमरुल एच. अंसारी ने कहा कि यह जलवायु डेटा संग्रह और विश्लेषण में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विभागाध्यक्ष प्रो. निजामुद्दीन खान ने स्वागत भाषण दिया। संचालन परियोजना समन्वयक प्रो. अतीक अहमद ने किया। प्रो. शहाब फजल ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
पांच साल के लिए प्रोजेक्ट को मिलेंगे 30 लाख रुपये
परियोजना समन्वयक प्रो. अतीक अहमद ने बताया कि एएमयू और इसरो के बीच करार हुआ है। यह पांच साल के लिए प्रोजेक्ट है। हर साल छह लाख रुपये यानी पांच साल में 30 लाख रुपये मिलेंगे। समय-समय पर मौसम गुब्बारा छोड़ा जाएगा।
इस तरह मिलेगा डेटा
परियोजना समन्वयक प्रो. अतीक अहमद ने बताया कि गुब्बारे में करीब छह मीटर की रस्सी बंधी होती है, जिसकी अंतिम छोर पर रोडियोसोंड लगा है, जिसकी दाहिनी ओर लगे जीपीएस से लोकेशन की जानकारी मिलेगी। बायीं ओर सेंसर लगा है, जो तापमान, आर्द्रता, दबाव, हवाओं की दिशा-गति की जानकारी एकत्र कर बीच में लगे ट्रांसमीटर को देगा। ट्रांसमीटर भूगोल विभाग की छत पर लगे रिसीवर को डेटा भेजेगा, जो स्क्रीन पर प्रदर्शित होगा।
यह होगा फायदा
भूगोल विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीकी ने बताया कि इस गुब्बारे से माैसम संबंधी जानकारी के साथ साथ जलवायु परिवर्तन का आंकड़ा भी जुटाया जा सकेगा। जैसे ही गुब्बारा हवा में गया, वैसे ही उसने डेटा भेजना शुरू कर दिया। मौसम पूर्वानुमान होने से प्राकृतिक आपदाओं को कम किया जा सकता है।