फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Aligarh News ›   From his first Mushaira victory to a lecturership, AMU's Mohammad Bashir

Aligarh News: मुशायरे की पहली जीत से लेक्चररशिप तक, एएमयू का वो मो. बशीर

Fri, 29 May 2026 02:29 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 29 May 2026 02:29 AM IST
विज्ञापन
From his first Mushaira victory to a lecturership, AMU's Mohammad Bashir
बशीर बद्र का फाइल फोटो - फोटो : File Photo
आज भले ही दुनिया उन्हें बशीर बद्र के नाम से पूजती हो, लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के दस्तावेजों और मार्कशीट पर उनका नाम मो. बशीर उर्फ बशीर बद्र दर्ज है। बशीर बद्र ने वर्ष 1969 में एएमयू के उर्दू विभाग से प्रथम श्रेणी में मास्टर ऑफ आर्ट्स (एमए) की डिग्री हासिल की थी। उस दौर में फैकल्टी ऑफ आर्ट्स के डीन सैयद नासिर अहमद हुआ करते थे।
विज्ञापन



एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राहत अबरार कहते हैं कि एएमयू के जनरल एजुकेशन सेंटर (जीईसी) में साल 1968 में हुए एक ऐतिहासिक मुशायरे में बशीर साहब ने अपनी शायरी से समां बांध दिया था और प्रथम पुरस्कार जीता था। तब जीईसी के को-ऑर्डिनेटर अनवर अंसारी थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एएमयू में बतौर लेक्चरर नई नस्लों को उर्दू तहजीब भी सिखाई। हालांकि, कुछ समय बाद वे यहां से मेरठ चले गए और फिर वहां से हमेशा के लिए भोपाल के हो गए।
विज्ञापन




कॅरिअर की व्यस्तता और 47 साल बाद मिली ''पीएचडी'' उपाधि


बशीर साहब अपनी रूहानी शायरी के दम पर देश-विदेश के मुशायरों की शान बन चुके थे। शोहरत की बुलंदियों और लगातार दौरों की मसरूफियत का आलम यह था कि वे अपनी डिग्रियां यूनिवर्सिटी में ही भूल गए। उन्होंने 1973 में एएमयू से पीएचडी पूरी कर ली थी, लेकिन न कभी उपाधि लेने का वक्त मिला और न जरूरत महसूस हुई।
विज्ञापन
विज्ञापन

तकरीबन 47 साल बाद, जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर जब परिवार को इस ऐतिहासिक उपाधि की याद आई, तो इसे हासिल करने की दास्तान भी किसी फिल्मी कहानी जैसी हो गई।




डिग्री के नाम पर अपनों ने ही की ''ठगी''
उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने एक बार बेहद भावुक मन से बताया था कि परिवार कई दशकों से इस डिग्री को एएमयू से निकलवाने की कोशिश कर रहा था। इस दौरान वे एक कड़वी ठगी का शिकार भी हुए। किसी करीबी शख्स ने डिग्री लाकर देने के नाम पर उनसे मोटी रकम ऐंठ ली, लेकिन डिग्री नहीं दिलाई।



जब डाक से घर पहुंची मोहब्बत
आखिरकार, बशीर साहब की साली ने खुद अलीगढ़ आकर विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क किया। मशहूर शायर के सम्मान में एएमयू प्रशासन ने फौरन सारे दस्तावेज तैयार कराए और 47 साल बाद उनकी पीएचडी की मूल डिग्री डाक के जरिए सीधे उनके भोपाल स्थित आवास पर भिजवाई। जब बशीर साहब के हाथों में एएमयू की वो डिग्री आई, तो अतीत की यादें उनकी आंखों में तैर गईं और उन्होंने नम आंखों से अपनी एएमयू का शुक्रिया अदा किया था।
बशीर साहब अक्सर कहा करते थे, मेरी शायरी को अलीगढ़ में आकर नया मयार (स्तर) मिला है। आज उनके जाने से न सिर्फ उर्दू अदब का एक सूरज डूब गया है, बल्कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) ने भी अपना एक नायाब सितारा खो दिया है।





सुरेश कुमार ने कहा-विस्मृति के दौर में भी महकती रहीं गजलें
वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश कुमार बशीर साहब को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं समकालीन उर्दू शायरी के इस सबसे चमकदार चेहरे का यूं चले जाना स्तब्ध कर गया। उनसे मेरी पहली मुलाकात करीब 35 साल पहले मेरठ के शास्त्रीनगर वाले घर में हुई थी। बशीर साहब की गजलों को देवनागरी के पाठकों तक पहुंचाने का सौभाग्य मुझे मिला।


साल 2004 में डायमंड बुक्स से उनका पहला संकलन ''उजालों की दरियां'' मेरे संपादन में आया। इसके बाद 2006 में धूप का चेहरा और 2008 में रोशनी के घरोंदे'' का संपादन भी मैंने किया। उनका जाना शायरी की दुनिया की ऐसी क्षति है जिसे कभी भरा नहीं जा सकता।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed