Good News: अब खेतों में नहीं जलेगी पराली, फसलों के अवशेष से बनेगी बिजली, होंगे घर रोशन
एकत्र की गई पराली को नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी), विभिन्न तापीय विद्युत परियोजनाओं और कंप्रैस्ड बायो गैस (सीबीजी) संयंत्रों में भेजा जाएगा। इससे न केवल जहरीले धुएं से मुक्ति मिलेगी, बल्कि कचरे के प्रबंधन का एक स्थायी समाधान भी निकलेगा।
विस्तार
अब खेतों में बेकार समझी जाने वाली और प्रदूषण का कारण बनने वाली पराली बिजली पैदा करने का जरिया बनेगी। अलीगढ़ जिला प्रशासन और कृषि विभाग की नई योजना के तहत जिले में हर साल पैदा होने वाली करीब 50 हजार मीट्रिक टन पराली का उपयोग विद्युत उत्पादन और बायो गैस बनाने में किया जाएगा। इससे लोगों का घर भी रोशन होगा।
लंबे समय से पराली जलाना किसानों की मजबूरी और पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था, लेकिन अब इस पराली को कचरा नहीं, बल्कि कैश माना जा रहा है। योजना के अनुसार, एकत्र की गई पराली को नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी), विभिन्न तापीय विद्युत परियोजनाओं और कंप्रैस्ड बायो गैस (सीबीजी) संयंत्रों में भेजा जाएगा। इससे न केवल जहरीले धुएं से मुक्ति मिलेगी, बल्कि कचरे के प्रबंधन का एक स्थायी समाधान भी निकलेगा।
जिले की करीब 50 हजार मीट्रिक टन पराली को विद्युत परियोजनाओं और बायो गैस प्लांट तक पहुंचाने की योजना तैयार है। इसमें गन्ने और सरसों की फसल के अवशेष का भी सदुपयोग होगा, जिससे प्रदूषण पर लगाम लगेगी।- राजेंद्र पचौरी, संयोजक, प्रशिक्षण जागरूकता कार्यक्रम, मिशन समर्थ
विज्ञापन विज्ञापन
सिर्फ पराली ही नहीं, गन्ने और सरसों का अवशेष भी होगा इस्तेमाल
इस परियोजना की खास बात यह है कि इसमें केवल धान की पराली ही शामिल नहीं है। बिजली और बायो गैस उत्पादन के लिए गन्ने की खोई (अवशेष) और सरसों के डंठल का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाएगा। पराली को पेलेट्स बनाकर कोयले के साथ इस्तेमाल किया जाएगा। पराली और फसल के अवशेषों से सीएनजी तैयार होगी। इससे खेतों में आग लगाने की घटनाओं में भारी कमी आने की उम्मीद है।
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिले में पराली और अन्य फसल अवशेषों के कलेक्शन की व्यवस्था की जा रही है, ताकि किसानों को इन्हें जलाने की जरूरत न पड़े। इससे एक ओर जहां मिट्टी की उर्वरक शक्ति बनी रहेगी, वहीं दूसरी ओर किसानों को उनके अवशेषों का उचित मूल्य मिल सकेगा।