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यूपी: रोचक इतिहास समेटे है ये सीट, मुख्यमंत्री को सिरमौर बनाया, अगले चुनाव में कर दिया बेताज, पढ़िए पूरी खबर
Wed, 26 Jan 2022 01:30 PM IST
Abhishek Saxena
राजीव वर्मा, संवाद न्यूज,एटा
राजीव वर्मा, संवाद न्यूज,एटा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 26 Jan 2022 01:30 PM IST
सार
एटा जनपद में निधौलीकलां से दो बार चुनाव लड़े थे पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव, 1977 में मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद इस सीट को पसंद किया था।
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रामनरेश यादव (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
उत्तर प्रदेश के एटा जनपद में निधौलीकलां (वर्तमान में मारहरा) विधानसभा सीट अपने आपमें रोचक इतिहास समेटे हुए है, जो लखनऊ की राजनीति तक केंद्रित रही है। यहां के मतदाताओं का मिजाज भी कुछ अलग है। 1977 में भी कुछ ऐसा हुआ था। जब मुख्यमंत्री चुनने के बाद रामनरेश यादव चुनाव लड़ने आए तो उन्हें जनता जनार्दन ने सिरमौर बनाया था, लेकिन जब इस पद से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ा तो जनता ने उन्हें बेगाना समझ बेताज कर दिया।
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परिसीमन के बाद मारहरा में तब्दील हुई ये सीट
पूर्व की निधौलीकलां विधानसभा सीट 2012 में परिसीमन के बाद मारहरा में तब्दील हो चुकी है। 1977 के चुनाव की कहानी ने इस सीट को प्रदेश की सियासत में सुर्खियों में ला दिया था। आपातकालीन को लेकर कांग्रेस के विरुद्ध लोगों में जबरदस्त गुस्सा था। इसके बाद 1977 में जब आम विधानसभा चुनाव हुए तो विभिन्न दलों के साथ लड़ी जनता पार्टी को अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला था। यहां निधौलीकलां से जनता पार्टी के राम सिंह विधायक चुने गए। उधर, लखनऊ की राजनीति ने करवट ली और आजमगढ़ के सांसद रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने उपचुनाव के लिए निधौलीकलां की सीट पसंद की, जिसे तत्कालीन विधायक राम सिंह ने उनके लिए छोड़ दिया।
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राज्यसभा के सदस्य तथा मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी बने
रामनरेश ने कांग्रेस के हंसराज वर्मा को हराकर जीत हासिल की, लेकिन वह ज्यादा समय मुख्यमंत्री न रह सके और इस्तीफा देना पड़ गया। 1980 में आम चुनाव आए तो रामनरेश ने इस सीट पर जनता पार्टी (सेक्यूलर) की टिकट से फिर दावेदारी कर दी, लेकिन तब तक परिस्थिति बदल चुकी थीं। कांग्रेस को तवज्जो मिली और हंसराज वर्मा से इस बार रामनरेश मात खा गए। हालांकि उनकी राजनीतिक पारी लंबी रही और बाद में वह राज्यसभा के सदस्य तथा मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी बने।
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