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खुशखबरी: चंबल में पहुंचे 580 नन्हे कछुए, दुनिया से लुप्त हो रहीं इन दो दुर्लभ प्रजातियों को मिला नया जीवन
Sun, 17 May 2026 01:37 PM IST
Arun Parashar
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Published by: Arun Parashar
Updated Sun, 17 May 2026 01:37 PM IST
सार
चंबल नदी में कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण हो रहा है। इनकी आबादी एक लाख से ज्यादा है, जिनमें कठोर कवच वाली ढोर, साल, पचेड़ा, काली ढोर तथा नरम कवच वाली स्योत्तर, कटहवा, सुंदरी, मोरपंखी प्रजातियां शामिल हैं।
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नदी में छोड़े जा रहे कछुए।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
चंबल की गोद में दुनिया में लुप्त हुए बटागुर कछुओं की साल एवं ढोर प्रजाति के 580 नन्हे मेहमान पहुंच गए हैं। शनिवार को नंदगवा के चीकनी पुरा घाट पर दोनों प्रजाति के नन्हें 342 कछुए नदी में पहुंचाए हैं। वन दरोगा राहुल जादौन, वन्यजीव रक्षक राजेश कुमार, धर्मेंद्र कुमार, नाविक टिंकू ने नदी में नन्हें मेहमान छोड़े हैं। इससे पहले 2 खेप में क्रमश: 130 और 108 बच्चे नदी में छोड़े गए थे।
बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि वन विभाग की मेहनत का सुखद परिणाम रहा है कि लुप्तप्राय बटागुर कछुआ की साल एवं ढोर प्रजाति के जन्मे बच्चे नदी की गोद में पहुंचे हैं। फरवरी, मार्च में कछुओं की साल और ढोर प्रजाति की नेस्टिंग हुई थी। चंबल नदी किनारे की बालू में घोंसला बना कर मादा ने 10 से 30 अंडे दिए थे। अंडों को जंगली जानवर सियार आदि से बचाने के लिए लोहे की जाली लगाई थी।
हैचिंग पीरियड शुरू होते ही मादा नेस्ट के आस पास घूमने लगती है, नेस्ट की बालू पर बैठ जाती है। हैचिंग के लिए वन विभाग नेस्ट की सुरक्षा में लगाई जाली हटा देता है। मादा कुरेद कर अंडों से बालू को हटा देती है। वह बच्चों के बाहर निकलने तक नेस्ट के पास ही रहती है। नेस्ट के अंडों से निकले बच्चों को इकट्ठा कर चंबल नदी में पहुंचाने में वन विभाग की टीमें जुटी हैं। नेस्ट की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। 15 साल से कछुओं के संरक्षण पर काम कर रहे टर्टल सर्वाइवल एलायंस (टीएसए) के प्रोजेक्ट ऑफीसर पवन पारीक ने बताया कि बटागुर कछुओं की साल प्रजाति सिर्फ चंबल नदी में बची है, जबकि ढोर प्रजाति के कछुओं की 98 फीसदी आबादी चंबल नदी में है। वहीं 2 फीसदी आबादी यमुना और गंगा नदी में बची है। संरक्षण के प्रयास सुखद रहे हैं।
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चंबल में पल रहीं कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियां
चंबल नदी में कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण हो रहा है। इनकी आबादी एक लाख से ज्यादा है, जिनमें कठोर कवच वाली ढोर, साल, पचेड़ा, काली ढोर तथा नरम कवच वाली स्योत्तर, कटहवा, सुंदरी, मोरपंखी प्रजातियां शामिल हैं। बाह के रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि कठोर कवच वाले कछुओं का बाहरी कवच कठोर होता है। यह अस्थियों का बना होता है। कवच कछुओं के लिए सुरक्षा या ढाल का काम करता है। ये कछुए शाकाहारी होते हैं और चंबल की सड़ी गली वनस्पतियों को खाकर पानी को साफ करते हैं। इनका स्वभाव सरल होता है, जबकि नरम कवच वाले कछुओं का बाहरी कवच मुलायम होता है। यह मांसपेशियों से बना होता है। ये मुख्यतः मांसाहारी होते हैं। इनका स्वभाव अक्रामक होता है। शिकारियों पर हमलावर हो जाते हैं।
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बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि वन विभाग की मेहनत का सुखद परिणाम रहा है कि लुप्तप्राय बटागुर कछुआ की साल एवं ढोर प्रजाति के जन्मे बच्चे नदी की गोद में पहुंचे हैं। फरवरी, मार्च में कछुओं की साल और ढोर प्रजाति की नेस्टिंग हुई थी। चंबल नदी किनारे की बालू में घोंसला बना कर मादा ने 10 से 30 अंडे दिए थे। अंडों को जंगली जानवर सियार आदि से बचाने के लिए लोहे की जाली लगाई थी।
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हैचिंग पीरियड शुरू होते ही मादा नेस्ट के आस पास घूमने लगती है, नेस्ट की बालू पर बैठ जाती है। हैचिंग के लिए वन विभाग नेस्ट की सुरक्षा में लगाई जाली हटा देता है। मादा कुरेद कर अंडों से बालू को हटा देती है। वह बच्चों के बाहर निकलने तक नेस्ट के पास ही रहती है। नेस्ट के अंडों से निकले बच्चों को इकट्ठा कर चंबल नदी में पहुंचाने में वन विभाग की टीमें जुटी हैं। नेस्ट की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। 15 साल से कछुओं के संरक्षण पर काम कर रहे टर्टल सर्वाइवल एलायंस (टीएसए) के प्रोजेक्ट ऑफीसर पवन पारीक ने बताया कि बटागुर कछुओं की साल प्रजाति सिर्फ चंबल नदी में बची है, जबकि ढोर प्रजाति के कछुओं की 98 फीसदी आबादी चंबल नदी में है। वहीं 2 फीसदी आबादी यमुना और गंगा नदी में बची है। संरक्षण के प्रयास सुखद रहे हैं।
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चंबल में पल रहीं कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियां
चंबल नदी में कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण हो रहा है। इनकी आबादी एक लाख से ज्यादा है, जिनमें कठोर कवच वाली ढोर, साल, पचेड़ा, काली ढोर तथा नरम कवच वाली स्योत्तर, कटहवा, सुंदरी, मोरपंखी प्रजातियां शामिल हैं। बाह के रेंजर उदय प्रताप सिंह ने बताया कि कठोर कवच वाले कछुओं का बाहरी कवच कठोर होता है। यह अस्थियों का बना होता है। कवच कछुओं के लिए सुरक्षा या ढाल का काम करता है। ये कछुए शाकाहारी होते हैं और चंबल की सड़ी गली वनस्पतियों को खाकर पानी को साफ करते हैं। इनका स्वभाव सरल होता है, जबकि नरम कवच वाले कछुओं का बाहरी कवच मुलायम होता है। यह मांसपेशियों से बना होता है। ये मुख्यतः मांसाहारी होते हैं। इनका स्वभाव अक्रामक होता है। शिकारियों पर हमलावर हो जाते हैं।